जितेन्द्र माथुर

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Jitendra Mathur


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वे सदा अपने प्रति ईमानदार रहे

Posted On: 30 Apr, 2017  
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रहस्य-रोमांच और भावनाओं के चितेरे को श्रद्धांजलि

Posted On: 14 Mar, 2017  
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Hindi Sahitya में

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सोनिया गाँधी के नाम खुला पत्र

Posted On: 4 Feb, 2017  
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सरकारी सम्मानों की बंदरबाँट

Posted On: 12 Jan, 2017  
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सपनों, संघर्षों और भावनाओं का जंगल

Posted On: 2 Jan, 2017  
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Entertainment में

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ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है : दीवान कैलाशनाथ

Posted On: 18 Dec, 2016  
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Hindi Sahitya में

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शर्तों पर प्रेम ?

Posted On: 25 Aug, 2016  
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स्वप्नद्रष्टा को नमन

Posted On: 20 Aug, 2016  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

लेख पर आपकी सम्मानित उपस्थिति एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए आपका सादर आभार आदरणीय सद्गुरु जी । कुछ संदर्भों में हम दोनों के मध्य वैचारिक मतभेद हैं और संभवतः आगे भी रहेंगे । इस सत्य के साथ हमें परिपक्व व्यक्तियों की भाँति समायोजन करना होगा । मैं व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के स्थान पर वस्तुपरक दृष्टिकोण को उचित समझता हूँ तथा मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि मूल्यांकन एवं आलोचनात्मक विश्लेषण में कभी दोहरे मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए । इस संसार में न तो कोई सर्वगुणसम्पन्न अथवा देवतुल्य हो सकता है और न ही किसी को केवल दोषों से युक्त माना जाना उचित है । उपलब्ध ठोस तथ्यों के आधार पर सभी के गुण-दोषों का निष्पक्ष विवेचन होना चाहिए । अंध-श्रद्धा किसी दिन श्रद्धालु के ही ठगे जाने का कारण बन सकती है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! सादरअभिनंदन ! आपने अपने भावुक मन से बहुत कुछ लिखा है, उसमे से कुछ तथ्यपरक भी है ! किन्तु आपकी इस बात से सहमत नहीं कि "भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का कोई कट्टर समर्थक भी अपनी पुत्री के लिए उनके जैसा वर नहीं चाहेगा क्योंकि ऐसा अत्यंत सफल जामाता भी किस काम का जो अपनी ब्याहता पत्नी को उसका न्यायोचित अधिकार एवं सम्मान न दे ?" आप भावना में बहकर इतिहास को ही भूल गए जो सत्य की खोज और राष्ट्र प्रेम के लिए घर परिवार के त्याग से भरा पड़ा है ! नरेन्द्र मोदी के अलावा भी महात्मा बुद्ध, महावीर, तुलसीदास, कई धर्मगुरुओं और बहुत से अन्य देशभक्तों ने भी यही महान कार्य किया ! सोनिया गांधी और नरेन्द्र मोदी की तुलना ही बेतुकी है ! परिवार संभालने से ज्यादा बड़ा कार्य देश संभालना है ! सबसे बड़ी बात ये कि पति-पत्नी आपसी रजामंदी से अपना अपना अलग जीने का मार्ग चुन लेते हैं तो उसमे बुरा क्या है ? देश में ऐसा करने वाले हजारों लाखों लोग हैं ! क्या वे सब निंदा के पात्र हैं ! नहीं, ये हमारी अपनी हीनभावना और बेतुकी सोच है जो हम उनकी स्वतंतत्रता और साथ न रह पाने वाली पीड़ा को महसूस नहीं करते हैं ! सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय जीतेन्द्र माथुर जी, सादर अभिवादन! नए साल की शुभकानाओं के साथ, मैं भी यही कहनेवाला हूँ कि मैंने भी सपरिवार कब फिल्म देखी मुझे तो याद नहीं है. शायद दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे या फिर और कोई! पिछले दिनों मैं कोलकता प्रवास में था. मेरी बेटी कोलकता में ही जॉब करती है और उसी के सौजन्य से मैं सपत्नी, और बेटी के साथ INOX मल्टीप्लेक्स सिटी सेंटर में ३० दिसम्बर को नाईट शो देखा. मैं भी वही महसूस करता हूँ जो आपने सविस्तार देखा. मैंने अपने पिछले ब्लॉग अलविदा २०१६ में सिर्फ चर्चा भर की है. आपने तो पूरी समीक्षा लिख डाली. कट्टरपंथी कई लोग फेसबुक पर आमिर खान का विरोध करते दिखे, पर मैं समझता हूँ उन्होंने भी फिल्म जरूर देखी है, दूसरों को देखने से रोकना चाहते हैं. PK का भी उसी तरह विरोध हुआ था, पर आमिर उसमे भी बाजी मार गए. यह फिल्म तो चल ही रही है... सपरिवार देखने लायक बेहतरीन फिल्म!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरनीय जीतेन्द्र माथुर जी, सादर अभिवादन ! अभी अभी मैंने आपके इस आलेख को सम्पूर्ण रूप से पाठ किया साथ ही आपकी उस समय की राजीव गाँधी की कृति, ख्याति, कमजोरी, मित्र और शत्रुओं, आस्तीन के साँपों का जिस तरीके से वर्णन किया है अन्यत्र शायद मिलना कठिन है. यह बात सही है की राजीव गाँधी मिस्टर क्लीन की छवि से विख्यात थे और विश्वनाथ प्रताप की पीठ में छुरा घोंपने वाली नीति के सामने विफल हो गए. साथ ही लिट्टे के दमन के कूटनीतिक प्रयास में भी बेवजह उनके निशाने पर आ गए और अचानक दुर्घटना के शिकार भी हो गए. नियति भी क्या क्या खेल दिखती है पूर्वानुमान करना कठिन है फिर भी आपने जिस प्रकार आपने निष्पक्ष ब्यौरा प्रस्तुत किया है आप सचमुच बधाई के पात्र हैं. मैं सरिता जी की प्रतिक्रिया से भी पूरी तरह सहमत हूँ. आज की राजनीती किस दिशा में जा रही है और इसका क्या खामियाजा आगे जाकर भुगतना पद सकता है यह भी अनुमान ही किया जा सकता है. एक बार पुनः: आपको बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

हार्दिक आभार आदरणीय हरिश्चंद्र जी । मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हृदय से किया गया शुद्ध प्रेम तथा सांसारिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण दो भिन्न तथ्य हैं । प्रेम हानि-लाभ को ध्यान में रखे बिना हृदय से किया जाता है और इसीलिए वह पवित्र होता है । भगवान कृष्ण का आपने उदाहरण दिया है लेकिन वे प्रेम द्वारा दूसरों को छलने में ही निष्णात थे । इसीलिए उनका प्रेम न तो वास्तविक था, न ही शुद्ध । शुद्ध एवं पवित्र प्रेम तो गोपियों का था जिनके प्रेम की कृष्ण ने अवहेलना ही की । जो गोपिकाओं के लिए जीवन भर किया जाने वाला वास्तविक प्रेम था, वह कृष्ण के लिए मात्र क्षणिक विलास था । रास कृष्ण ने रचाया लेकिन प्रेम गोपियों ने किया । प्रेम को वही जान सकता है जिसने किसी से वास्तव में प्रेम किया हो ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

कोई शर्त होती नहीं प्यार में, मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया नज़र में सितारे जो चमके ज़रा, बुझाने लगीं आरती का दिया जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो, अंधेरों में अपने ही घिरने लगो तब तुम मेरे पास आना प्रिये, ये दीपक जला है जला ही रहेगा तुम्हारे लिये, कोई जब ... आदरणीय जीतेन्द्र माथुर जी ! अब ऐसे प्रेमी कहाँ ! आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया है कि सम्मान किसका होना चाहिए – पुरुष के गुणों तथा स्त्री के प्रति उसकी भावनाओं का या फिर पुरुष की भौतिक सफलता का ? सहमत हूँ आपसे कि सम्मान प्रेम का होना चाहिए ! अनुभव की गहराई से आपने ये लेख लिखा है ! नवीन और रोचक प्रयास ! हार्दिक बधाई और बहुत अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

जीतेन्द्र जी नमस्कार, आज समय ऐसा है कि आप किसी राजनितिक व्यक्ति की चर्चा भी करें तो आप पर उस पार्टी का चमचा होने का आरोप लग सकता है. इस सस्ती राजनीती से न डरते हुए आपने श्री राजीव गाँधी की उपलब्धियों और गलतियों का सम्पूर्ण और निष्पक्ष ब्यौरा प्रस्तुत किया , इसके लिए आप सराहना के पात्र हैं.कुछ बुरा समय चल रहा है जो कांग्रेस पार्टी की रेटिंग गिर गयी है वर्ना मुझे याद है अयोध्या में रामजन्मभूमि के मंदिर का शिलान्यास श्री राजीव गाँधी जी ने रातो रात बिना किसी हो हल्ले के अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में करवाया था. वो दिन है और आज का दिन..हज़ारों बड़बोले आंदोलनों के बाद भी उस एक नींव की ईंट के सिवा, वहां मंदिर का निर्माण न हो सका...

के द्वारा: sinsera sinsera

जीतेन्दर जी फिल्म सुल्तान एक व्यवसायिक फिल्म है फिल्म ऱोचक  बनाना ही व्यवसायी का उद्देश्य है | किन्तु आपकी प्रेम पर की गयी चिंता और उस पर जवाहर जी की टिप्पणी और उस पर आपका वास्तव मैं दुनियां की सार्थकता वास्तविक अर्थों मैं व्यक्त करता है | ....प्रथम प्रेम रूप से ..जवानी से ...ज्ञान से ...धन से ...शक्ति से ....जीवन यापन से ... बच्चों के हित के लिए ...बुडापे मैं सहारे के लिए ...फिर परलोक के लिए ......।......ढाई आखर पेम का पडे सो पंडित होय ।  किंतु स्वार्थ  ऱुपी दीमक पेम की मजबूत   नीव भी पल मैं चट कर जाती है ।,,,,आपकी प्रेम गाडी भावात्मक तो अच्छी लगती है । भगवान क्रष्ण प्रेम पंडित माने जाते हैं । उनके प्रम पर बडे बडे भाष्य लिखे जा चुके हैं । किंतु वास्तविक धरातल पर वे भी असफल रहे । बस ओम शांति शांति जहाॅ महसूस हो जाये वहीं प्रेम है ।

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, सादर अभिवादन! इधर मैं बहुत ज्यादा फ़िल्में तो नहीं देखता पर चचित फ़िल्में देखने का प्रयास करता हूँ. मैं भी सुल्तान देखना चाहूँगा. पर आपने एक साथ कई फिल्मों के साथ यशपाल जी के झूठा- सच तक को भी समेट लिया इस बात को साबित करने के लिए कि - ‘कोई शर्त होती नहीं प्यार में मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया . . . ।’ बात सही है! पर गोस्वामी जी को आप क्या कहेंगे जिन्होंने बहुत पहले लिख दिया - सुर नर मुनि सब की यह रीति, स्वार्थ लागि करहीं सब प्रीति! अर्थात स्वार्थ तो हर जगह है ...इसलिए एक बात और कहना चाहता हूँ कि - तुलसी इस संसार में भांति भांति के लोग ... इसीलिये तो यह संसार है, पूण्य-पाप, धर्म-अधर्म ....सब कुछ एक दुसरे से सम्बंधित है ...! अन्य सुविज्ञ जन शायद और प्रकाश डाल सकें, आपकी इस विवेचनायुक्त प्रेम के शर्त को... सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया शोभा जी, संभवतः आप मेरे दृष्टिकोण को समझ नहीं सकीं । मैंने अलगाववादियों के हाथ में काश्मीर देने की बात नहीं की है, वरन खुले मस्तिष्क वाले निष्पक्ष एवं संवेदनशील लोगों को वहाँ के जनसामान्य के मध्य स्थापित करने की बात की है । मैंने लेख के शीर्षक में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि समस्या पर सतही आधार पर विमर्श करके उसकी सरलीकृत व्याख्या करने से उसका समाधान संभव नहीं है । समस्या के सभी पक्षों का गहन अध्ययन आवश्यक है । अलगाववाद एवं उससे जुड़ी हिंसा समस्या का केवल एक पक्ष है । समस्या के अन्य भी कई पक्ष हैं जिनकी उपेक्षा हुई है और इसी उपेक्षा से यह समस्या दिनोंदिन उलझती ही गई है जिसका लाभ हमारे चिरशत्रु पड़ोसी देश ने उठाया है । इस राज्य के शासन-प्रशासन में सत्यनिष्ठता, कर्तव्यपरायणता तथा सबसे बढ़कर संवेदनशीलता का सन्निवेशन ही इस समस्या को सुलझाकर इसके समाधान का पथ-प्रशस्त करेगा । बिना धार्मिक विभेद के प्रत्येक पीड़ित के घाव पर लेप लगाकर उसकी पीड़ा को हरना तथा प्रत्येक नेत्र के अश्रु पोंछना ही सभी संबंधित व्यक्तियों को अपना अभीष्ट मानना होगा । युवा-मुस्लिमों के मन में सेना की छवि अकारण नहीं बिगड़ी है । उसके कारणों को ढूंढकर उनका निराकरण करना तथा प्रत्येक पीड़ित को न्याय देना सेना तथा प्रशासन दोनों का ही ध्येय होना चाहिए । पूर्वाग्रहों को लेकर चलने से तो हम उसी गोल घेरे में घूमते रहेंगे जिसमें दशकों से घूम रहे हैं । और समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम अविलंब उठाने होंगे, खोखली बातों से कुछ नहीं होने वाला । बलपूर्वक तो भूमि को ही अधिकार में रखा जा सकता है, मानवों को नहीं । शक्ति-प्रदर्शन से हृदय नहीं जीते जाते । विचार-विनिमय के लिए आपका हार्दिक आभार ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

 श्री जितेन्द्र जी  यहाँ में आपसे सहमत नहीं हूँ हमारा देश महासंघ नहीं है देश का संविधान है शक्तिशाली केंद्र है बड़ी मुश्किल से रियासतों को मिला कर संगठित राष्ट्र बना है इस तरह से भारत से पंजाब तमिलनाडु अरुणाचल प्रदेश ( इस पर चीन अपना हक जमाता है ) अलग होते जायेंगे कश्मीरी पंडितों को निकाल दिया अब आतंकवादी प्रवृति के अलगाववादियों के हाथ में कश्मीर दे क्र इस्लामिक स्टेट के कंसेप्ट को अपने पास बुलाना है देश की रक्षा कुर्बानी मांगती है इस तरह हर गली मुहल्ले में देश बटता जाएगा क्या कश्मीर से शांत हो जायेंगे यहाँ जेहादी कैंप बना क्र हमे ही जीने नहीं देंगे हमी नहीं पूरा विश्व त्रस्त है जब तक इस्लामिक स्टेट का कंसेप्ट है कभी शान्ति से जी नहीं पाएंगे भारत का विभाजन यही सोच क्र स्वीकार किया था अब भारत शन्ति से जियेगा सिर कटा भारत ही स्वीकार है क्या जी पाए हैं

के द्वारा: Shobha Shobha

जितेंद्र जी नमस्ते ! काश्मीर के ऊपर विस्तृत लेख देखकर, सही कहूँ, आज हर दम भागदौड़ करने वाले इंसान को इतने लंबे चौड़े लेख को देखकर ही जल्दी से पन्ना पलटने का मन होता है ! मैंने आपका पूरा लेख पढ़ा और समझने की भी कोशिश की ! बहुत प्रयास किया है आपने, लेख सामग्री के लिए तथ्य जुटाने के लिए, कुछ फिल्मों का जिक्र भी आपने किया है ! मैं स्वयं एक फौजी हूँ और अपने पूरी ३०-३२ सालों में, मैं जम्मू, रणवीरसिंहपूरा, (बॉर्डर) पूंछ, राजौरी, श्रीनगर, कारगिल और लेह लद्दाक में २० साल रहा ! मैं १९८५ के अंतिम चरम में सैना से पेंशन आगया था ! सं १९६५ की लड़ाई में मैं पूंछ, राजौरी, में था ! इन २० सालों में हम पाकिस्तानियों से काश्मीरियों के रक्षक ही नहीं थे बल्कि वहां की आम जनता से वार्तालाप द्वारा उनकी सम्याओं के बारे में जानकारी हासिल करना और निदान करना भी सामिल था ! हर बटालियन वहां की आम जनता और उनके खच्चरों को पहाड़ियों के ऊपर सामान पहुंचाने का काम करवाते थे और उनका अच्छा मेहताना भी दिया जाता था, सरकारी पैसा होता था उसका ऑडिट भी होता था, उनके काम से फ़ौज भी खुश थी और वहां की जनता भी ! उन्हें सैनिक स्टोर से राशन भी दिया जाता था, इलाज भी सैनिक नर्सरी होम से किया जाता था ! अमन चैन था ! किसी को कोई शिकायत नहीं थी ! यहां तक की काश्मीरी जनता से पढ़े लिखे लोग सैना के लिए पाकिस्तानी सैनिकों और उनके कार्यकलाप के बारे में भी सैना को अवगत करते थे ! सर्दियों के लिए हर घर को कम्बल और स्पेशल कोटे से कैरोसिन सप्लाय किया जाता था ! वह तो काश्मीरी पंडितों को वहां से भगा कर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने वहां का नक्शा बदला है ! ये अलगाववाद आतंकवाद काश्मीरी नहीं हैं वे सारे असली काश्मीरियों की आवाज दबाकर अपनी आवाज उठा रहे हैं ! अगर यूएनओ से निष्पक्ष टीम आकर आज पाक अक्यूपाइड काश्मीर की जनता से उनकी राय मांगे की 'वे पाक में रहना चाहते हैं या भारत का हिस्सा बनना चाहते हैं' तो वे भारत के हक़ में मत देंगे ! हाँ यह भी सही है की सैना में भी कुछ काली भेंडे हैं लेकिन निंयत्रित हैं ! ये काश्मीर के बारे में बोलने और लिखने नेता, मीडिया वाले न असली काश्मीरी हैं और न वे कभी काश्मीर गए हैं, केवल मीडिया में अपना नाम अमर रहे ! आपकी मेहनत के लिए साधुवाद !

के द्वारा: harirawat harirawat

हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी । लेकिन काश्मीरी मुस्लिम युवकों में इस त्रुटिपूर्ण मानसिकता के विकास के लिए बहुत सीमा तक हमारे राजनेता ही उत्तरदायी हैं जो पीड़ा देना तो जानते हैं, पीड़ाहारी लेप लगाना नहीं जानते । आपके कथनानुसार यदि विवेकशील काश्मीरी पहले ही दिल्ली में आने की व्यवस्था कर चुके हैं तो ऐसे में अविवेकी लोगों से भरे काश्मीर को अपने साथ रखकर भी हम क्या करेंगे ? काश्मीर में हजारों करोड़ का पैकेज फूँककर काश्मीरियों का हृदय विजित करने की आशा करना स्वयं को छलना ही है । आहत भावनाओं को न्याय का मरहम चाहिए, वे बिकाऊ नहीं होतीं । जब काश्मीर भावनात्मक रूप से हमारा नहीं तो भौतिक एवं राजनीतिक रूप से भी कब तक हमारा रह पाएगा ? और प्रश्न केवल काश्मीर का ही तो नहीं, जम्मू एवं लद्दाख का भी तो है जो बेचारे विगत सात दशकों से उपेक्षा सह रहे हैं लेकिन उफ़ तक नहीं करते ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

श्री जितेंद्र जी कश्मीर पर विचारणीय लेख 'सुशिक्षित काश्मीरी मुस्लिम युवक भी मजहबी अपनत्व के कारण पाकिस्तान से ही हमदर्दी रखते हैं जबकि भारत के प्रति कोई सौहार्द्र अपने मन में रखे बिना भी भारत के ही संसाधनों का उपयोग अपने हित-साधन के लिए करने में वे किसी झिझक का अनुभव नहीं करते ' सही हैं वह मुस्लिम का स्वर्ग इस्लामिक देश चाहते हैं लेकिन जानते नहीं हे उनके साथ क्या होगा कश्मीर आतंकवादियों का स्वर्ग वन जाएगा आतंकवाद की पाठशालाएं विवेकशील कश्मीरी वैसे ही दिल्ली में आने की व्यवस्था कर चुके हैं बाकी पत्थर बाजों के हाथ में गन पकड़ा दी जायेगी जेहाद के लिए भारत की तरफ मोड़ दिया जाएगा इन अलगाववादियों को भी कुछ नहीं मिलेगा कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है बना रहे तभी भारत में सुख शान्ति रह सकती है बहुत विचारणीय लेख अति सुंदर आपका लेख देर से पढ़ने के लिए मिला

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, सादर अभिवादन! एक जटिल समस्या पर अपनी पैनी लेखनी की धार से जो कुछ आपने लिखा है, बहुत मार्मिक और संवेदनशील भी है. श्री राहुल ढोलकिया के द्वारा शोध पूर्ण अंदाज में जो कुछ भी समाधान बताया गे है काबिले तारीफ है. मेरी जानकारी के अनुसार ऐसी फ़िल्में सिनेमाघरों में चलती कम है. फिर भी प्रयास की सराहना की जानी चाहिए. अभी हाल ही में मैंने मदारी देखी. ए वेडनेसडे भी बहुत पहले देखी थी. ये सभी संवेदनशील मुद्दों पर बनाई गयी फ़िल्में हैं. यह दर्शकों को आकर्षित नहीं करती पर सोचने पर मजबूर अवश्य करती है. आपके इस ब्लॉग को साधुवाद! मैं चाहूँगा की इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें और अपनी स्वस्थ और निष्पक्ष राय रक्खें! मामले को उलझाने के बजाय सुलझाना बेहतर है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

हार्दिक आभार सरिता जी जो आपने मेरे लेख को पढ़ने के लिए अपना अमूल्य समय निकाला । अगर आप पाठक साहब के उपन्यासों को पसंद करती हैं तो 'कागज की नाव' ज़रूर पढ़िएगा । यह उनके सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है । मुझे जानकर दुख हुआ कि अब आपके पिता जी तथा बड़े भाई साहब नहीं रहे । उन्हें मेरा नमन । आपसे आग्रह है कि जब भी आपको समय मिले, अपने सृजन के साथ अवश्य मंच पर आएं । मैं मंच से 2014 में जुड़ा हूँ यद्यपि सृजन के क्षेत्र में मेरी सक्रियता बहुत पहले से रही है । मंच पर अनेक विद्वान, अनुभवी एवं प्रतिभाशाली लेखकों के संपर्क में आने एवं उनसे बहुत-कुछ सीखने का अवसर मिला है मुझे जिसके लिए मैं मंच का आभारी हूँ ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा:

हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर जी । पढ़ने का शौक मुझे बचपन से ही है । चाहे साहित्य की श्रेणी में आकर सम्मानित होने वाली और स्वतः ही उत्कृष्ट मान ली जाने वाली पुस्तकें हों या लुगदी के नाम से बदनाम कम दाम वाली किताबें, मैंने दोनों ही खूब पढ़ी हैं । एक ज़माना था जब ऐसे लुगदी साहित्य से पठन-सामग्री का बाज़ार अटा रहता था । नब्बे के दशक में स्थितियां बदलीं । गुलशन नन्दा और कुशवाहा कांत तो अब दिवंगत ही हो चुके हैं । जीवित लेखकों में केवल सुरेन्द्र मोहन पाठक ही बचे हैं जिनकी लेखनी उनकी आयु के आठवें दशक में भी सक्रिय है और अपनी आभा बिखेर रही है । मेरा सौभाग्य है कि मैं सुरेन्द्र मोहन पाठक को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । वे केवल जासूसी कथाकार ही नहीं, एक उत्तम दार्शनिक भी हैं और एक अत्यंत संवेदनशील मनुष्य भी हैं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: sanjeevtrivedi sanjeevtrivedi

श्री आदरणीय जितेन्द्र जी आपका लेख बहुत अच्छा लेख हर बार पढ़ने पर सोचने को नई दिशा देता लेख ात : में दो तीन बार पढ़ने के बाद उसका सार समझ कर सोचती हूँ व्यक्ति पूजा हमारी राजनीति में इतनी घर कर गई हैं विवेक का प्रयोग ही हम नहीं करते हैं सामने वाले को भी प्रशंसा मैग्लोमैनिक बना देती है बहुत कम ऐसे हैं जो अपनी निंदा सुन सक्ले हैं फिर लिख रही हूँ बहुत अच्छा लेख ऐसा लग रहा है जैसे पेपर पढ़ रही हूँ |"राजनीति में सफलता का अर्थ है सत्ता की प्राप्ति और भारतीय राजव्यवस्था में सत्ताधारियों के पास असीमित शक्तियां होती हैं । ऐसे में सत्ता के शिखर बिन्दुओं पर जा बैठने वालों का ईश्वर की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर लेना स्वाभाविक ही होता है" बहुत अच्छे विचार

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीय जितेन्द्र माथुर जी, सादर अभिवादन! आपने हाथ के कंगन को आइना दिखा दिया . मानव जीवन, फिल्मों को गीता के साथ जोड़ दिया - वाह! गीता में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को स्थितप्रज्ञ बनने का जो परामर्श दिया है, वह अमूल्य है । स्थितप्रज्ञ का अर्थ है – वह मनुष्य जो अपने जीवन के प्रत्येक समय एवं प्रत्येक स्थिति में अपना मानसिक संतुलन बनाए रखे तथा चाहे सौभाग्य आए अथवा दुर्भाग्य, सुख मिले अथवा दुख, हानि हो अथवा लाभ; कभी असंतुलित न हो । जो सफलता मिलने पर प्रसन्नता में उन्मादित न हो तथा असफलता मिलने पर अवसादग्रस्त न हो जाए, वही स्थितप्रज्ञ है । ऐसा व्यक्ति ही जीवन-नौका को संसार-सागर में सहज रूप से खे सकता है क्योंकि उसके पास दो पतवारें हैं – सफलता के चढ़ाव के लिए आत्म-नियंत्रण की तथा असफलता के उतार के लिए धैर्य की । अपने जीवन में बहुत संघर्ष करने वाली तथा कठिन समय देखने वाली कंगना को उनकी इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई देते हुए मैं उनके लिए भी तथा हम सबके लिए भी स्थितप्रज्ञता की ही प्रार्थना करता हूँ । महत्वपूर्ण आलेख के लिए आपका अभिनन्दन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Shobha Shobha

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! सार्थक और विचारणीय लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन ! दूसरों को दुःख देकर ख़ुशी महसूस करना एक मानसिक विकृति है, जिसके लिए पूर्वकृत यानि पूर्वजन्म के कर्मों के अलावा संगति और माता पिता के दिए हुए संस्कार भी जिम्मेदार होते हैं ! पहले संत गाँव गाँव गली गली पैदल घूमते थे और अच्छे सस्कारों के सात्विक बीज बोते थे ! अब तो महल जैसे आश्रम, राजनीति और उलजुलूल बोलकर नारदमुनि जैसी मीडिया पर छाये रहना ही उनकी दिनचर्या है ! जबतक गरीबों के झूठ बोलने, जुआ खेलने, दारु पीने, गाली-गलौज और लड़ाई-झगड़ा करने के कुसंस्कार नहीं बदलेंगे, मोदी जी अकेले क्या करेंगे और उनकी किस्मत कितना बदल देंगे, जो खुद अपने कर्मों से अपनी किस्मत खराब कर रहे हैं ! आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, आपको और आपके समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई ! सादर आभार !

के द्वारा:

हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर जी । समान विचारों और भावनाओं से युक्त हृदय निकट आ ही जाते हैं । आपने अपने ब्लॉग और कविता दोनों के अंश यहाँ देकर मुझे कृतार्थ किया और अपने ब्लॉग का लिंक देकर तो इस ब्लॉग की उपयोगिता बहुत बढ़ा दी । मैंने आपकी भावभीनी रचना 'मेरे बाबूजी की लघुकथा' पढ़ी जिसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं । 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई' को यथासंभव अपनाना चाहिए लेकिन मेरा यह लेख दोहे की दूसरी पंक्ति 'परपीड़ा सम नहीं अधमाई' पर केन्द्रित है । परपीड़ा तो वैसे ही अवांछनीय है और उससे आनंदित होने वाले को तो मनुष्य कहलाने का ही अधिकार नहीं क्योंकि परपीड़ा से आनंद तो कोई राक्षस ही प्राप्त कर सकता है ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय जितेंद्र जी आप मेरे कितने करीब होते जा रहे हैं आप को मैं बताऊँ? मेरे पुराने ब्लॉग का कुछ हिस्सा मेरे बाबूजी -मेरे बाबूजी बहुत ही नियमित जीवन ब्यतीत करते थे .. प्रकृति के आस-पास ही रहते थे, इसलिए उन्हें जल्दी कोई बीमारी भी नहीं होती थी, दिनभर खेतों में काम करने के बावजूद, शाम को रामायण लेकर दालान में बैठ जाते थे और लालटेन की रोशनी में रामायण पढ़कर लोगों को सुनाते और समझाते थे…. मेरे गाँव के बहुत सारे लोग मेरे बाबूजी को श्रद्धा की नजरों से देखते थे. वे एक गृहस्थ होते हुए सदाचार का भरपूर पालन करते थे. हर पूर्णमासी या विशेष पर्व त्यौहार के दिन पटना जाकर गंगा-स्नान करना और वहां से कुछ मिठाई आदि लेकर ही घर लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल था. ऐसा कोई दिन नहीं होता था जिस दिन वे बिना नहाये और पूजा किये खाना खाए होंगे! यह नियम उनका तबतक चलता रहा, जबतक कि वे लाचार होकर बिस्तराधीन नहीं हो गये. उनके अंतिम क्षणों में मैं और मेरे भैया दोनों ने यथासंभव सेवा की .. मैं समझता हूँ आज भी उनका आशीर्वाद हम सबके साथ है - उनका ब्रहम वाक्य – “बेटा हो सके तो किसी का भला कर दो, पर किसी का बुरा चाहना भी मत!” उनके उदगार में कुछ पक्तियां कोई बच्चा जब रोता हो उसका बापू ही धोता हो तब खैर नहीं होगी उसकी खायेगा चाचा की फटकी बच्चे को गोद उठाकर के लेमनचूस खिला कर के बाबूजी तब खुश होते थे कंधे पर उसको ढोते थे. पूरे ब्लॉग का लिंक भी दे रहा हूँ - http://jlsingh.jagranjunction.com/2012/06/15/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80/ और परहित सरिस धरम नहीं भाई ... मेरे जीवन का भी मूल मन्त्र है. सादर! बच्चे को संस्कार देना माँ बाप का काम है यही कहूँगा. हाँ हम समाज से प्रभावित जरूर होते हैं क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

श्री जितेंद्र जी बहुत अच्छा भावनात्मक लेख "बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि परपीड़ानन्द की ऐसी प्रवृत्ति विकसित कैसे होती है ? " एक बात मेरी समझ में आती है कहीं कसूर वार माता पिता भीं हैं बच्चों को किसी भी बात से टोकते नहीं हैं एक प्रवृति है जोहमें नहीं मिला वह हम सब इन्हें देंगे कुछ ऐसा होता है जिसे देने में असमर्थ हैं उन्हेंबच्चे छीनने लगते हैं बंद कमरों में कम्प्यूटर में बच्चे क्या देख रहे हैं कार रेस कर रहे हैं उसके साथ उत्तेजना में चीख रहें हैं |मेरे समय में ऐसा नहीं था बच्चों को न सुनने की आदत थी खिलोने भी अच्छे होते थे बड़ी मुश्किल से मिलते थे |बात बात पर मुक्के चलाना किसी पर भी गाडी चढ़ा देना आपने आज की परिस्थितिओं के अनुसार सामयिक लेख द्वारा पाठकों को सोचने के लिए विवश किया है

के द्वारा: Shobha Shobha

श्री जितेन्द जी आपने मन्दिरऔर शान्ति का जिक्र किया मेरे नाना परिवार में राधा कृष्ण का मन्दिर हए वः मूर्ति लगभग १८० वर्ष पुरानी हैं मेरे चार मामा बहुत ऊंचें पदों पर थे छोटे मामा मन्दिर की सेवा करते थे मन्दिर हमारी अपनी मल्कियत था बस आरती के लिए खुलता था मैं कालेज के दिनों में थोड़ी नास्तिक थी परन्तु जब भी कभी मैं अपने मन्दिर में बैठती थी मुझे अजीब शान्ति मिलती थी मैने वहाँ रखी पुस्तकों को उलटना पलटना शुरू किया वहाँ अंग्रेजी में छपी रामायण मिली में पढ़ कर हैरान रह गयी व अमेरिकन द्वारा संस्कृत से अंग्रेजी में ट्रांसलेशन पुस्तक थी उसमें आधुनिक बातें थी जैसे हनुमान और सुग्रीव ने विचरण करते समय घुमती पृथ्वी का वर्णन क्या जिस तरह स्पेस में घुमती पृथ्वी जब यह पुस्तक ट्रांसलेशन की गयी थी स्पेस साईंस का कुछ पता नहीं था और भी बहुत कुछ बस में आस्तिक हो गयी अपने धर्म से जुड़ गयी मेरी शादी भी मथुरा में हुई पूरा परिवार बांके बिहारी को मानता है जब भी मैं दर्शन करने जाती हूँ मुझे अपने ननिहाल वाली मूर्ति दिखती हैं |

के द्वारा: Shobha Shobha

हार्दिक आभार जवाहर जी । जागरण पर शब्द-सीमा के कारण यह विस्तृत लेख भी अपूर्ण ही है । सम्पूर्ण लेख मेरे ब्लॉग पर है । वी.पी. सिंह ने न केवल जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ करके देश के करोड़ों ऊर्जावान और आदर्शवादी युवाओं को धोखा दिया वरन आरक्षण के नाम पर ऐसी चिंगारी सुलगा दी जिसने दावानल बनाकर सम्पूर्ण राष्ट्र को झुलसा दिया है । उन्होंने अन्य राजनेताओं को वोट लेने का सरल मार्ग दिखा दिया जिस पर सत्ता-आधारित राजनीति के चलते सभी चल पड़े और भुगता निर्दोष जनता ने और भारतीय समाज ने । अब यह रोग नासूर बन चुका है और एक दिन सम्पूर्ण देश इसकी बलि चढ़ जाएगा जो कि इसके कारण गृहयुद्ध के द्वार पर आ पहुँचा है । इस आरक्षण ने तो हमारी संवेदनशीलता, हमारी नैतिकता और शाश्वत जीवन मूल्यों में हमारे विश्वास की ही बलि ले ली है जवाहर जी । जाट आरक्षण के नाम पर हुए कथित आंदोलन में जो घृणित अपराध हुए, उन्होंने मेरे संवेदनशील मन को भीतर तक झकझोर दिया और तब मुझे याद आया कि इस चिंगारी को सुलगाने वाला वही व्यक्ति था जिसके द्वारा छले गए करोड़ों युवा भारतीयों में मैं भी था । और तब मेरे आहत मन ने लेखनी थाम ली यादों के खंडहरों में विचरने के लिए ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: jlsingh jlsingh

aadarneey जितेंद्र माथुर जी, आपने तो वी पी सिंह पर शोध ग्रन्थ ही तैयार कर लिया है. आप ठीक कह रहे हैं की मंडल की आग में जैसे उस समय पूरा देश जल रहा था इस बार भी कुछ ऐसा ही प्रकरण उठ खड़ा हुआ है ,जैसे हार्दिक पटेल का आंदोलन, जाट आंदोलन ...आदि आदि. संभवत: उसी के सन्दर्भ में आपने यह लेख तैयार किया होगा अन्यथा इस समय वी पी सिंह को याद करने का क्या तुक था. इसमें मेरा मानना है की नेता लोग अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं और जनता भेद की तरह पीछे दौड़ लगा लेती है. शिक्षा का प्रचार प्रसार और बीच बीच में सांस्कृतिक मिलान कार्क्रम ऐसा हो जिसमे सभी जाती धर्म सम्प्रदाय भाषा भूलकर एक दूसरे से गले मिलें और देश को आगे बदःने में सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल करें जैसा कि कल मोदी जी ने कहा था. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

श्री जितेन्द जी आपके लेख की जितनी प्रशंसा की जाये कम है राष्ट्रपति जैसे पद पर आसीन पर आलोचनात्मक लेख लिखना आसान नहीं हैं मुझे भी याद है जब इंदिरा जी का स्वर्गवास हुआ था यह भी कलकत्ते से प्रधानमन्त्री बनने आये थे इंदिरा जी के यह चहेते भी थे परन्तु उस समय की कूटनीति थी राजिव जी को प्रधान मंत्री बनाया गया | प्रणव दा ने सोनिया गांधी से भी नजदीकियां बनाने की कोशिश की अब वह जिस पद को सुशोभित कर रहे हैं महामहिम इसके बाद बस रिटायर्मेंट है |लेख क्या था ऐसे लग रहा था जैसे मैं किसी कालेज के सेमीनार का पेपर पढ़ रही हूँ आपने इनके जीवन के हर राजनीतिक पहलू पर प्रकाश डाला आपका लेख अखबारों में छपने वाले लेखों से भी उत्तम है

के द्वारा: Shobha Shobha

माननीय जितेंद्र माथुर जी "पारिवारिक संपत्ति में स्त्री के अधिकार"अति सुविचारित एवं तथ्यों से पूर्ण लेख है बहुत बहुत साधुवाद | इस विषय पर बहुत कुछ कहा गया है परन्तु अभी भी समाज को और जागरूक करने की आवशयकता है |सभ्यता के विकास से ही स्त्री उपेक्षित रही हैसंदेह ही नहीं | कुछ अपवाद छोड़ दें तो स्थिति आज भी कमो बेश वैसी ही बनी हुई है| कानून के भय से थोड़ा बहुत परिवर्तन आया है परन्तु मानसिकता अभी भी नहीं बदली| लेकिन इस समस्या का एकमात्र समाधान शिक्षा है| बढ़ती जनसँख्या के साथ संपत्तियां भी कितनी बची हैं लेकिन आज वक्त बौद्धिक संपत्ति का है न कोई बाँट सकता है न कोई छीन सकता है झगड़ा भी कोई नहीं| पाश्चात्य देशों ने बहुत पहले इस जरूरत को समझा | स्त्री हो या पुरुष सभी अपने पांव पर खड़े हैं भौतिक संपत्ति में ज्यादा उलझना ही नहीं होता | लेकिन अपने देश की विडंबना देखो, शिक्षा का ढिंढोरा बहुत पीटा जा रहा है| जमीनी सचाई बहुत ही कड़वी है |शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाये काफी समस्याएं दूर होती जाएँगी | जब तक आप जैसे बुद्दिजीवियों का सरोकार दिखलाई देता है उम्मीद बाकि है | धन्यवाद |

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय का निराकरण हो और उन्हें अपना जायज़ हक़ मिले, इस बारे में कोई दो-राय नहीं हो सकती । किन्तु साथ ही यह भी तो सुनिश्चित हो कि स्त्री-पुरुष सौहार्द्र अक्षुण्ण रहे, परिवार न टूटें, समाज न बिखरे ।इस के लिए माथुर साहब कानून भी ऐसा न हो जिसे हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सके I मैं बात कर रहा हूँ दहेज़ निरोधक धारा 498ए की जिसका दुरपयोग महिलाओं व उनके मायकेवालों के द्वारा आजकल बखूबी किया जा रहा है Iसमाज को जाग्रत कर ही असली न्याय हो सकता है कानून के द्वारा केवल दबंगई रोकी जानी चाहिए Iकानून का सहारा लेकर दबंगई करना भी अपराध निर्धारित होना चाहिए I कानून का दुरपयोग महिला व पुरुष आजकल दोनों कर रहे हैं I सादर अभिवादन माथुर साहब अच्छा लेख लिखा है

के द्वारा: atul61 atul61

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, भारतीय समाज की कुब्यवस्था पर आपकी कलम खूब चल रही है, जो सराहनीय है. बहुत कम लोग ऐसा सोचते हैं. कानून और भावना में सामंजस्य का होना जरूरी है, मेरे दृष्टिकोण से. हम क्या चाहते हैं कि अदालतों का दरवाजा खटखटाएं .. कोई भी आम व्यक्ति मजबूरी में ही कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगता है. अगर सब कुछ आपसी समझ से ठीक-ठाक रहे तो इन कोर्ट कचहरियों की आवश्यकता ही न पड़े. फिर वहीं जरूरत आन पड़ती है नैतिकता की, परंपरा की. परिवर्तन समय की मांंग है और अब जहाँ महिलाएं सजग हुई हैं वहीं माँ- बाप भी बेटे बेटियों में समानता का प्रयास करते दीख र्रहे हैं. कोई व्यक्ति एक बेटी में ही खुश रहता है ...कई बेटियां होने पर भी वह बेटी में ही बेटा का रूप देखता है. ... थोड़ा हम आगे बढ़ें थोड़ा तुम आगे बढ़ो. समाज को भी बदलना होगा और बदलाव आएगा, सही शिक्षा से, नैतिकता से ... बस मेरी सोच तो यही कहती है. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय जीतेन्द्र माथुर साहब, आपने विभिन्न उदाहरणों के द्वारा अपनी और एक पीड़ित समाज की पीड़ा को उभारा है. निश्चित ही इसके कई कारण हैं, एक तो नैतिक शिक्षा का अभाव, दूसरा समाज का अपनी जिम्मेदारी से भागना. तीसरा जनप्रतिनिधियों की वोट बैंक की चिंता. और चौथा न्यायपालिका का दोषपूर्ण निर्णय और निर्णय में देरी है ... पुलिस बहुत हद तक दोषी है, पर उसके भी अनेक कारण हैं. सर्वप्रथम मेरी समझ में जो आता है नैतिकता का पतन सबके मूल में है ... अब हम किसी भी अज्ञात शक्ति से नहीं डरते ... कर्मफल का डर रहा ही नहीं. भगवान को भी रिश्वत देकर खरीद लेने के दम्भी हो गए हैं. इसलिए हम सभी दोषी है. एक बहुत बड़ी क्रांति की जरूरत है, जो आये दिन सड़कों पर दिख जाती है. जरूरत है, एक समर्थ नेता की जो इन भटकती शक्तियों को एक जगह इकठ्ठा कर उसका राष्ट्र और समाज निर्माण में उपयोग करे. मेरी समझ इतनी ही आई है, आगे भगवान मालिक है, अगर वह है तो? सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

किशोर अपराधियों की संख्या बढ़ने के लिए क्या समाज स्वयं उत्तरदायी नहीं है शोभा जी जो उन्हें न अच्छे संस्कार दे रहा है, न स्वच्छ और सात्विक वातावरण और न ही अपने भीतर की सकारात्मक और सृजनात्मक प्रवृत्तियों को उभारने की प्रेरणा ? जिन बालकों के पथभ्रष्ट होने के लिए समाज ही उत्तरदायी है, उन्हीं को सूली चढ़ाकर कर न तो समाज उनके प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में हुई विफलता के आरोप से बच सकता है और न ही भविष्य के लिए कोई आशा जगा सकता है । जिन बालकों को उनके लिए विधान बनाने वाले जनप्रतिनिधियों को चुनने तक का अधिकार नहीं है, क्या उन्हें विधान बनाकर फाँसी पर लटका दिया जाए ? निर्भया के दोषी समाज के निर्धन और कमज़ोर वर्गों से आए हैं, क्या यह बात काबिल-ए-ग़ौर नहीं है ? बालकों को सूली चढ़ा देना या जीवन-भर के लिए कारागृह में डाल देना क्या ऐसे अपराधों में कोई कमी ला देगा ? निर्भया कांड के आरोपियों के दंडित किए जाने के उपरांत ऐसी घटनाओं में कमी नहीं वरन भारी बढ़ोतरी हुई है । समस्या को हल करने के लिए उसकी जड़ पर प्रहार करना होगा शोभा जी, पत्तियों को काटने से तो समस्या रूपी वृक्ष ज्यों-का-त्यों ही रहेगा और समय के साथ-साथ उसमें नई-नई पत्तियाँ आती जाएंगी । नशीली दवाएं और अश्लील साहित्य बालकों को मानसिक रूप से भ्रष्ट और दुश्चरित्र बनाकर ऐसे जघन्य अपराधों की ओर धकेलते हैं लेकिन ये कानून के रखवालों की ही सरपरस्ती में सम्पूर्ण देश में धड़ल्ले से उपलब्ध हैं । निर्भया कांड के शोर में क्या किसी ने समस्या के इस पहलू की ओर भी ध्यान दिया है जो सीधे समस्या के उद्गम से जुड़ा है ? नहीं न ? लालची राजनेताओं और विवेकहीन मीडिया ने तो उस अभागी को एक ब्रांड बना दिया है । दरअसल हम एक पाखंडी समाज में रहते हैं जो दूसरों पर ही उंगली उठाना जानता है, आत्मालोचन करना नहीं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

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सर जिस विषय का आपने जिक्र किया है लिखना आसान नहीं हैं कालेज में तो पेपर पढने का सम्मान मिलता है "जागरण मंच भी ऐसी चोरियों से अछूता नहीं है । यहाँ भी एक महानुभाव हैं जिन्होंने सितंबर 2015 में जागरण जंक्शन पर प्रकाशित मेरे लेख – ‘उदारीकरण : अंधी दौड़’ (जिसके लिए मुझे सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान दिया गया था) की हूबहू नक़ल करके ‘भारत में उदारीकरण और समाजवाद की अवधारणा’ के नाम से एक लेख हमारे इस सम्मानित मंच पर डाल दिया था जो कि आनन-फानन फ़ीचर भी हो गया । हद यह थी कि यह चोरी किया गया लेख तब फ़ीचर हो रहा था जबकि मेरे द्वारा लिखित मूल लेख अभी साप्ताहिक सम्मान के कारण होमपेज पर मौजूद था । यानि कि नक़लची ब्लॉगर साहब को मूल लेख के होमपेज से हटने तक का भी धैर्य नहीं था । या फिर यह चोरी और सीनाज़ोरी का नायाब नमूना था ।" जागरण की यह उदासीनता है |तभी कई लोग मंच से विदा हो गये |

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