जितेन्द्र माथुर

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नक़लचियों का बोलबाला

Posted On: 9 Dec, 2015 Others में

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सारी दुनिया में आज नक़लचियों का बोलबाला है । नक़लची हर जगह घुस जाते हैं और दूसरों के सृजन को कॉपी-पेस्ट करके या फिर चंद अल्फ़ाज़ की हेरा-फेरी करके वाह-वाही (और भौतिक लाभ भी) लूटते हैं जबकि वास्तविक सर्जक कई बार अपनी सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ रहता है । साहित्य और कला के क्षेत्र में यह आम बात है । कभी-कभी नक़ल करने वाले लोग मूल सृजनकर्ता को (प्रेरणा देने का) श्रेय भी दे देते हैं जबकि बाज़ मर्तबा ऐसा भी होता है कि जिसे श्रेय दिया जा रहा है, उसने भी किसी और की नक़ल ही की थी । कृतिस्वाम्य या कॉपीराइट का विधान इस संदर्भ में केवल समर्थ लोगों के लिए ही प्रभावी होता है (वैसे भारत की तो सम्पूर्ण वैधानिक व्यवस्था ही समर्थों के लिए हैं जो न्याय को मुँहमांगे दाम चुकाकर क्रय कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति के लिए न्याय है कहाँ ?) । आर्थिक और व्यावहारिक रूप से अपेक्षाकृत दुर्बल सृजनकर्ताओं को इससे कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है । प्रत्यक्षतः कॉपीराइट द्वारा सुरक्षित बौद्धिक सम्पदा की चोरी को भी रोक पाने में भी भारतीय विधि-व्यवस्था प्रायः प्रभावहीन ही सिद्ध होती है ।

कुछ वर्ष पूर्व आई हिन्दी फ़िल्म ‘दबंग’ का एक गीत ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए’ बहुत लोकप्रिय हुआ तथा यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है ।  यह गीत 1995 में आई हिन्दी फ़िल्म ‘रॉक डांसर’ के गीत ‘लौंडा बदनाम हुआ लौंडिया तेरे लिए’ की नक़ल है जिसे माया गोविंद ने लिखा था और बप्पी लहरी ने संगीतबद्ध किया था । लेकिन वस्तुतः वह गीत भी मशहूर भोजपुरी लोकगीत ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए’ की ही नक़ल था जिसे ताराबानो फैज़ाबादी के स्वर में उत्तर-मध्य भारत की कई पीढ़ियों ने सुना और उसका आनंद उठाया । चूंकि यह लोकगीत है, इसलिए अधिकतर लोकगीतों की तरह इसके मूल लेखक का भी कोई पता नहीं । लेकिन पहले ‘रॉक डांसर’ में और डेढ़ दशक बाद ‘दबंग’ में इस गीत को थोड़े हेर-फेर के साथ उठा लिया जाना निर्लज्ज साहित्यिक और सांगीतिक चोरी का ही नमूना कहा जा सकता है । और यह कोई एक ही उदाहरण नहीं, ऐसे ढेरों उदाहरण हैं ।

कई वर्ष पूर्व चर्चित फ़िल्मकार श्याम बेनेगल द्वारा अपनी फ़िल्म ‘वेल डन अब्बा’ की कहानी के लिए जीलानी बानो को उनकी कहानी – ‘नरसईंया की बावड़ी’ और संजीव कदम को उनकी कहानी ‘फुलवा का पुल’ के लिए श्रेय दिया था क्योंकि बेनेगल ने अपनी फ़िल्म की कहानी इन कहानियों से प्रेरणा लेकर लिखी थी । लेकिन जब मैंने रमेश गुप्त जी द्वारा दशकों पूर्व रचित व्यंग्य ‘चोरी नए मकान की’ पढ़ा तो मैं दंग रह गया क्योंकि फ़िल्म की कहानी उस अत्यंत पुराने भूले-बिसरे व्यंग्य से बहुत मिलती-जुलती थी । इसका आशय यह हुआ कि बेनेगल ने जिन कथाओं को पढ़कर अपनी फ़िल्म की कथा रची थी, वस्तुतः उन कथाओं के लेखकों ने  अपनी रचनाओं की विषय-वस्तु गुप्त जी के व्यंग्य से ही चुराई थी ।

भारत में हिन्दी के असंख्य उपन्यास विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारकर धड़ल्ले से लिखे गए हैं और अब भी लिखे जाते हैं । लुगदी साहित्य के नाम से रचे गए उपन्यासों के लेखकों ने पहले तो यह सोचकर विदेशी उपन्यासों की नक़ल मारी कि हिन्दी के पाठक वर्ग को विदेशी भाषाओं के साहित्य का क्या पता ।  लेकिन अपनी इस चोरी के पकड़े जाने के बाद भी वे खम ठोककर यही करते रहे क्योंकि उन्हें कॉपीराइट संबंधी कानून का कभी कोई खौफ़ नहीं रहा ।

कई भाषाओं में बनाई गई चर्चित फ़िल्म ‘दृश्यम’ के लेखक ने निर्लज्ज होकर उसे अपनी ‘मौलिक कहानी’ के नाम से प्रचारित किया जबकि यह सर्वविदित था कि ‘दृश्यम’ की कहानी स्पष्टतः जापानी उपन्यास ‘द डिवोशन ऑव सस्पैक्ट एक्स’ से प्रेरित थी जिस पर जापानी भाषा में फ़िल्म भी बनी थी । लेकिन श्रेय और लाभ के बुभुक्षित लोगों को लज्जा कहाँ आती है । वे नक़ल को भी एक बहुत बड़ी कला समझते और मानते हैं और अपनी इस निपुणता पर गर्वित भी होते हैं ।

चर्चित अभिनेता और फ़िल्मकार आमिर ख़ान और उनके निर्देशक आशुतोष गोवारीकर ने अपनी फ़िल्म ‘लगान’ की कहानी के मौलिक होने का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी । लेकिन सच्चाई यह है कि ‘लगान’ का मूल विचार बी॰आर॰ चोपड़ा द्वारा निर्मित-निर्देशित अपने समय की अत्यंत सफल और प्रशंसित फ़िल्म ‘नया दौर’ से उठाया गया था जिसमें दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं । स्वयं आमिर ख़ान ने ‘लगान’ के अनेक दृश्यों में ‘नया दौर’ के दिलीप कुमार की भाव-भंगिमाओं की हूबहू नक़ल की है । फिर भी मौलिकता का दावा ? ऐसे निष्णात नक़लची संभवतः स्वयं को महाज्ञानी और शेष संसार को निपट मूर्ख समझते हैं ।

सारांश यह कि साहित्य और कला की चोरी एक लाइलाज़ बीमारी है । चूंकि यह चोरी सरलता से की जा सकती है, इसीलिए चोर निर्भय रहते हैं । अकसर तो चुराए गए संगीत या साहित्य के वास्तविक सर्जक अपने सृजन की इस चोरी से अनभिज्ञ ही रहते हैं और यदि वे जान भी जाएं तो चोर के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई करने में स्वयं को अक्षम ही पाते हैं । संगीत और साहित्य के कद्रदानों को भी इत्तफ़ाक़ से ही पता लगता है कि जिस सृजन को वे सराह रहे हैं, वह वस्तुतः किसी और की प्रतिभा और परिश्रम का सुफल है ।

जागरण मंच भी ऐसी चोरियों से अछूता नहीं है । यहाँ भी एक महानुभाव हैं जिन्होंने सितंबर 2015 में जागरण जंक्शन पर प्रकाशित मेरे लेख – ‘उदारीकरण : अंधी दौड़’ (जिसके लिए मुझे सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान दिया गया था) की हूबहू नक़ल करके ‘भारत में उदारीकरण और समाजवाद की अवधारणा’ के नाम से एक लेख हमारे इस सम्मानित मंच पर डाल दिया था जो कि आनन-फानन फ़ीचर भी हो गया । हद यह थी कि यह चोरी किया गया लेख तब फ़ीचर हो रहा था जबकि मेरे द्वारा लिखित मूल लेख अभी साप्ताहिक सम्मान के कारण होमपेज पर मौजूद था । यानि कि नक़लची ब्लॉगर साहब को मूल लेख के होमपेज से हटने तक का भी धैर्य नहीं था । या फिर यह चोरी और सीनाज़ोरी का नायाब नमूना था । मैंने इस बाबत डॉ॰ कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी, एल॰एस॰ बिष्ट जी और शोभा जी जैसे कुछ सम्मानित ब्लॉगरों से संपर्क करके उनसे सलाह मांगी और डॉ॰ सेंगर जी तथा बिष्ट जी से सहयोगपूर्ण प्रत्युत्तर भी मिला । लेकिन उन नक़लची महोदय द्वारा पोस्ट किया गया वह चोरी का लेख आज भी जागरण जंक्शन से हटाया नहीं गया है । मैं उनके सम्मान को अक्षुण्ण रखते हुए उनका यहाँ नाम नहीं ले रहा हूँ लेकिन उन्हें सरलता से पहचाना जा सकता है क्योंकि उनके ज़्यादातर लेख कहीं-न-कहीं से नक़ल करके ही बनाए जाते हैं । अस्सी प्रतिशत भाग किसी और के सृजन से उठाकर बाकी बीस प्रतिशत भाग वे अपने राजनीतिक झुकाव  के अनुरूप (निम्नस्तरीय भाषा में) दाएं-बाएं जोड़ देते हैं । चूंकि नक़ल में भी अक़्ल की ज़रूरत होती है, उनके किसी भी लेख को पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि उसका कौनसा भाग उन्होंने स्वयं लिखा है क्योंकि उस भाग में न केवल वर्तनी और व्याकरण की ढेरों अशुद्धियाँ होती हैं बल्कि वह संदर्भहीन एवं अर्थहीन भी होता है । लेकिन उनके लेख बराबर जागरण जंक्शन पर फ़ीचर हो रहे हैं । ज़ाहिर है कि जागरण जंक्शन के संबंधित कर्ताधर्ता न मौलिकता को जाँच रहे हैं, न गुणवत्ता को परख रहे हैं । जैसे हमारे देश की विभिन्न व्यवस्थाएं चल रही हैं, संभवतः वैसे ही जागरण जंक्शन का कामकाज भी चल रहा है । इसका परिणाम यह हो रहा है कि ये नक़लची महानुभाव निडर होकर अपने द्वारा विभिन्न स्रोतों से चुराई गई सामग्री जागरण पर नियमित रूप से पोस्ट कर रहे हैं और फ़ीचर होने का खोखला आनंद भी नियमित रूप से ही उठा रहे हैं ।

अत्यंत खेद और क्षोभ का विषय है यह ।

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ravindra K Kapoor के द्वारा
December 10, 2015

सुन्दर और सटीक लेख. 5 stars धन्यवाद

Jitendra Mathur के द्वारा
December 10, 2015

बहुत-बहुत धन्यवाद कपूर साहब ।

Sonam Saini के द्वारा
December 10, 2015

नमस्कार सर …… देखा जाये तो बहुत ही गंभीर विषय है ये, मुझे तो समझ नही आता कि कोई किसी की रचना को चुरा कर अपना कैसे कह सकता है, कोई आत्मसम्मान होता है या नही, आत्मा धिक्कारती नही है ऐसा करने पर ….., रचना चोरी होने पर एक लेखक को कैसा लगता है मैं महसूस कर सकती हूँ …………………,जैसे हमारे देश की विभिन्न व्यवस्थाएं चल रही हैं, संभवतः वैसे ही जागरण जंक्शन का कामकाज भी चल रहा है….., आपके लेख की ये लाइन्स मुझे बहुत प्रभावी लगी ….. एक अच्छे लेख के लिए बधाई व शुभकामनाये …..

Jitendra Mathur के द्वारा
December 11, 2015

बहुत-बहुत धन्यवाद सोनम । ऐसी निर्लज्जता आम देखी जाती है । ऐसा करने वालों की अंतरात्मा ही उन्हें ऐसा करने से रोक सके तो ठीक वरना विधि-विधान और प्रबंधन व्यवस्थाओं की जटिलता तो चोरों के लिए ही सुविधाजनक रहती है, संबंधित बौद्धिक-सम्पदा के वास्तविक स्वामियों के हितों की सुरक्षा के लिए नहीं ।

sadguruji के द्वारा
December 11, 2015

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! बहुत अच्छा लेख ! जबसे इंटरनेट पर लिखा जाने लगा है, तबसे कॉपी पेस्ट कर नक़ल करने का चलन कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है ! आपकी सम्मानित रचना “‘उदारीकरण : अंधी दौड़” (17 Sep, 2015) और “भारत में उदारीकरण और समाजवाद की अवधारणा !” (28 Sep, 2015) दोनों पढ़कर देखा ! हूबहू नक़ल देखकर मैं भी हैरान रह गया ! वहां कोई कमेंट नहीं है, शायद ब्लॉगर मित्र और पाठक इस बात को समझ गए थे ! जागरण मंच के संचालकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए और इस तरह की नक़ल पर कड़ी कार्यवाही भी करनी चाहिए ! निश्चित रूप से यह यह एक गंभीर मुद्दा है, जिसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए ! मंच पर ये गंभीर मुद्दा उठाने के लिए हार्दिक आभार !

Jitendra Mathur के द्वारा
December 11, 2015

बहुत-बहुत आभार आदरणीय सद्गुरु जी । आशा है, मंच का प्रशासन इस बाबत कोई सार्थक कदम उठाएगा ।

yamunapathak के द्वारा
December 12, 2015

जीतेन्द्र जी आपकी शिकायत वाज़िब है …पर हर व्यक्ति की एक विशिष्ट शैली होती है अतः रचना और रचनाकार को समझना बहुत आसान है . साभार

Jitendra Mathur के द्वारा
December 12, 2015

बहुत-बहुत आभार यमुना जी । मैं सहमत हूँ आपसे । लेकिन मंच के कर्ताधर्ताओं का तो यह दायित्व है कि ऐसी प्रवृत्तियों पर रोक लगाएं, कम-से-कम उन्हें बढ़ावा तो न दें ।

Shobha के द्वारा
December 12, 2015

श्री जितेन्द्र जी आपने लीं समस्याओं को उठाया है वः फ़िल्मी जगत में आम है कई घोस्ट राईटर हैं उनकी कहानियाँ सस्ते में खरीद ली जाती हैं वः प्रसिद्ध होने पर ईनाम मिलने पर मायूस हो कर रह जाते हैं ऐसे ही गीतों का हाल है आपने बहुत अच्छा विषय ले कर जन साधारण का ध्यान खींचा है बहुत अच्छा लेख

Shobha के द्वारा
December 12, 2015

सर जिस विषय का आपने जिक्र किया है लिखना आसान नहीं हैं कालेज में तो पेपर पढने का सम्मान मिलता है “जागरण मंच भी ऐसी चोरियों से अछूता नहीं है । यहाँ भी एक महानुभाव हैं जिन्होंने सितंबर 2015 में जागरण जंक्शन पर प्रकाशित मेरे लेख – ‘उदारीकरण : अंधी दौड़’ (जिसके लिए मुझे सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान दिया गया था) की हूबहू नक़ल करके ‘भारत में उदारीकरण और समाजवाद की अवधारणा’ के नाम से एक लेख हमारे इस सम्मानित मंच पर डाल दिया था जो कि आनन-फानन फ़ीचर भी हो गया । हद यह थी कि यह चोरी किया गया लेख तब फ़ीचर हो रहा था जबकि मेरे द्वारा लिखित मूल लेख अभी साप्ताहिक सम्मान के कारण होमपेज पर मौजूद था । यानि कि नक़लची ब्लॉगर साहब को मूल लेख के होमपेज से हटने तक का भी धैर्य नहीं था । या फिर यह चोरी और सीनाज़ोरी का नायाब नमूना था ।” जागरण की यह उदासीनता है |तभी कई लोग मंच से विदा हो गये |

Jitendra Mathur के द्वारा
December 12, 2015

बहुत-बहुत धन्यवाद शोभा जी । मंच के प्रशासकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए ।

pkdubey के द्वारा
December 14, 2015

आदरणीय ,बाजार वाद के इस दौड़ में आचरण विलुप्त हो रहे हैं ,पर विचार छीने नहीं जा सकते ,नकलची बहुत शीग्र पकडे जाते हैं,और फिर -उघरे अंत न होहिं निबाहू ||मेरा व्यक्तिगत मानना है-सभ्यता सिंधु घाटी या मोहनजोदड़ो की खुदाई से नहीं निकली ,सभ्यता ,इंसान के मनो -मश्तिष्क और उसकी सोच और उसके कर्मो से प्रतिविम्बित होती है | सादर |

Jitendra Mathur के द्वारा
December 14, 2015

आभार दुबे जी आपका । पूरी तरह सहमत हूँ मैं आपके विचारों से ।

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
December 16, 2015

जितेन्द्र माथुर जी आपने बहुत महत्वपूर्ण पहलू पर यह लेख लिखा है । हम उम्मीद करते हैं कि इसके प्रकाशन के बाद इस मंच के संचालक अवश्य आपकी समस्या को समझ कर कोई समाधान निकालेंगे । इस प्रकार की नकल मौलिक लेखक को आहत करती है । इस विषय पर उचित कदम उठाये जाने की तत्काल आवश्यक्ता है ।

Jitendra Mathur के द्वारा
December 16, 2015

बहुत-बहुत आभार बिष्ट जी । मैं भी यही आशा करता हूँ ।


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