जितेन्द्र माथुर

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प्रश्न पारिवारिक संपत्ति में स्त्री के अधिकार का

Posted On: 4 Feb, 2016 Others में

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कुछ वर्ष पूर्व केंद्रीय सरकार ने तलाक के उपरांत पति की संपत्ति में पत्नी के अधिकार संबंधी कानून में संशोधन किया था जिसकी प्रशंसा भी हुई थी, आलोचना भी । पत्नी या यूं कहें कि स्त्री की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया था । इसके तथा इसके जैसे अन्य विधानों को बनाए जाने की पृष्ठभूमि में है पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्थाओं में स्त्री को दिया गया दोयम दरज़ा, उसकी जीवन-यापन हेतु सदा पुरुष पर निर्भर रहने की विवशता तथा उसके प्रति पुरुष वर्ग द्वारा किए जाते रहे अन्याय । स्वाभाविक रूप से, इन विधानों के निर्माण का एकमात्र प्रयोजन है स्त्री के प्रति न्याय ।  
संसार की प्रत्येक विषय-वस्तु के दो पक्ष होते हैं पहला यथार्थ जो कि विद्यमान है और दूसरा आदर्श जो कि होना चाहिए । नारी के संदर्भ में भारतीय आदर्श तो यही होता कि नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पगतल में, पीयूष स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में किन्तु जिस कटु एवं पीड़ादायक यथार्थ से भारतीय महिलाएं सदा दो-चार होती रही हैं वह है अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी । आधुनिक महिलाएं जब मध्ययुगीन इतिहास पढ़ती होंगी तो उन्हें यह बात निश्चय ही चुभती होगी कि संपत्ति में भागीदारी तो दूर, स्त्रियों को तो स्वयं ही पुरुषों की संपत्ति माना जाता था । आज भी हिन्दू विवाह-संस्कार  में कन्यादान  की प्रथा सम्मिलित है जिसके मूल में यही धारणा है ।
भारतीय आयकर विधान में करदाताओं की एक श्रेणी रही है – हिन्दू अविभाजित परिवार जिसमें परिवार के ज्येष्ठम पुरुष सदस्य को कर्ता की प्रस्थिति प्राप्त होती है एवं वह विभिन्न वैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत परिवार के कार्यकलापों के लिए उत्तरदायी माना जाता है । यह सामंतवादी व्यवस्थाओं में पिता के देहांत के उपरांत पुत्र के राज्याभिषेक तथा उत्तर भारत के हिन्दू परिवारों में अब भी होने वाली रस्म पगड़ी के लगभग समकक्ष ही है जिसमें परिवार के सभी दायित्व (और स्वभावतः सभी अधिकार) पुत्र के ही होते हैं, पुत्री के नहीं । हिन्दू अविभाजित परिवार से जुड़ी वैधानिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत पैतृक संपत्ति के विभाजन की मांग भी परिवार के पुरुष ही कर सकते हैं, महिलाएं नहीं । अविवाहित कन्याओं की स्थिति तो और भी विकट रही है । पूर्व में लागू व्यवस्थाओं के अधीन उन्हें तो पैतृक संपत्ति के विभाजन की स्थिति में किसी भी भाग का अधिकारी ही नहीं माना जाता था और उनका अधिकार केवल भरण-पोषण तक ही सीमित माना जाता था । विवाह के उपरांत वे अपने जन्म के परिवार की सदस्य भी नहीं रहती थीं और उनकी सदस्यता उनके पति के परिवार में स्वतः ही स्थानांतरित हो जाती थी ।
भारतीय संपत्ति अधिनियम तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत ये प्रत्यक्षतः अन्यायपूर्ण प्रावधान भारतीय समाज में कन्या के अनिवार्यतः होने वाले विवाह तथा उसके विवाह में दिए जाने वाले दहेज की प्रथा से जोड़कर देखे जाने पर इतने अधिक अन्यायपूर्ण प्रतीत नहीं होते । दहेज-प्रथा एक बहुत बड़ा सामाजिक अभिशाप है, इसमें कोई संदेह नहीं । किन्तु जब यह आरंभ हुई होगी तो इसके पीछे एक उचित तर्क यही रहा होगा कि माता-पिता अपनी धन-संपत्ति में पुत्री का भाग उसे दहेज के रूप में तब दे दें जब वह वैवाहिक जीवन में प्रवेश करके उनके परिवार को छोड़कर अपने ससुराल जा रही हो । इसे कानूनी भाषा में स्त्रीधन कहा जाता है जिस पर पूर्ण अधिकार संबंधित स्त्री का ही होता है, उसके पति का नहीं । स्त्री का पति यदि दिवालिया घोषित हो जाए तो भी स्त्रीधन को कुर्क नहीं किया जा सकता ।
किन्तु महिलाओं की स्थिति शताब्दियों से शोचनीय ही रही है । उनके जीवन से जुड़े सभी निर्णय पुरुषों द्वारा ही लिए जाते रहे तथा उन पर थोपे जाते रहे हैं । महिलाओं को उनके उचित अधिकार देने के मामले में पुरुष वर्ग सदा से कृपण रहा है तथा कई सामाजिक प्रथाएँ उनके प्रति अन्याय करने वाली ही नहीं, अमानवीय भी रही हैं । अठारहवीं शताब्दी तक प्रचलित सती प्रथा के पीछे संभवतः विधवा के परिजनों द्वारा उसकी संपत्ति हड़पने की मानसिकता ही थी । आज भी वृंदावन में जैसे-तैसे अपना जीवन बिता रही विधवाओं की दयनीय स्थिति के मूल में भी यही बात है कि उनके परिवार वाले उनके प्रति अपना कोई दायित्व नहीं मानते और पति के देहांत के उपरांत ऐसी स्त्री उन्हें परिवार पर भार लगने लगती है ।
ऐसे में विधि-विधान तो बनाए ही गए हैं, तथाकथित न्यायिक सक्रियता के चलते न्यायालय भी वैधानिक व्यवस्थाओं से इतर ऐसे निर्णय सुना रहे हैं जो महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देते हुए प्रतीत हों । न केवल तलाक़शुदा महिलाओं वरन पुरुष के साथ बिना विवाह किए (लिव-इन) रहने वाली महिलाओं के हितों का भी ध्यान रखने वाले निर्णय देखने में आए हैं । अब ऐसे निर्णय सार्वभौम रूप से कितने लागू होते हैं, यह एक पृथक बात है किन्तु भारतीय न्यायाधीश अपने विवेक से ऐसे निर्णय संभवतः अपनी ओर से प्राकृतिक  न्याय के सिद्धान्त के अनुरूप  ही दे रहे हैं । यदि भारतीय पुरुष वर्ग महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण न्यायपूर्ण रखता तो ऐसे न्यायिक निर्णयों की नौबत ही न आती । 
हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में वर्ष 2005 में किए गए संशोधन द्वारा विवाहित पुत्रियों का भी पैतृक संपत्ति में अधिकार सुनिश्चित किया गया है । प्रश्न यह है कि क्या विवाहित स्त्री पिता और पति दोनों ही की संपत्ति में दावा कर सकती है ? यदि हाँ तो क्या यह न्यायपूर्ण है ? पारंपरिक मानसिकता के अनुसार विवाह के उपरांत स्त्री अपने पति के घर की हो जाती है तथा तदनुरूप उसका अधिकार अपने पति की संपत्ति में ही होना चाहिए । किन्तु यदि पति शराबी हो, जुआरी हो, दुराचारी हो तथा अपनी सम्पूर्ण संपत्ति को फूंक दे तो ऐसे में आश्रय के लिए क्या पुत्री अपने माता-पिता की ओर न देखे जिनके यहाँ वह जन्मी है, जिनकी गोद में खेलकर वह बड़ी हुई है ?
लेकिन क्या परिवार के भीतर के स्त्री-पुरुष संबंधों की हर बात अर्थ से ही जुड़ी हुई रहेगी ? क्या स्त्री-पुरुष केवल संपत्ति में भागीदारी से ही सरोकार रखेंगे ? क्या भाई-बहिन का स्नेह, पति-पत्नी का अनुराग आदि कोई मूल्य नहीं रखते ? क्या हम यह चाहते हैं कि रक्षाबंधन के दिन बहिन अपने भाई की कलाई पर स्नेह का धागा बांधने के स्थान पर पैतृक संपत्ति में भागीदारी को लेकर न्यायालय में उससे लड़े ? क्या हम यह चाहते हैं कि जीवन-साथी एक नई संस्कारी पीढ़ी के निर्माण हेतु सौहार्द्र पूर्वक संयुक्त प्रयत्न करने के स्थान पर संपत्ति के मामले को लेकर वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया में फंसे रहें ? आख़िर हम भविष्य में समाज को किस रूप में देखना चाहेंगे ? समाज की धुरी है परिवार और परिवार की धुरी है महिला । महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय का निराकरण हो और उन्हें अपना जायज़ हक़ मिले, इस बारे में कोई दो-राय नहीं हो सकती । किन्तु साथ ही यह भी तो सुनिश्चित हो कि स्त्री-पुरुष सौहार्द्र अक्षुण्ण रहे, परिवार न टूटें, समाज न बिखरे ।

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
February 4, 2016

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! एक अहम मुद्दे पर बहुत सार्थक और विचारणीय लेख ! मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ! आपने सही कहा है कि पारिवारिक सम्पत्ति की लड़ाई रिश्तों के सौहार्द को समाप्त कर रही है, जो बहुत चिंताजनक है !

Jitendra Mathur के द्वारा
February 4, 2016

बहुत-बहुत आभार आदरणीय सद्गुरु जी ।

jlsingh के द्वारा
February 5, 2016

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, भारतीय समाज की कुब्यवस्था पर आपकी कलम खूब चल रही है, जो सराहनीय है. बहुत कम लोग ऐसा सोचते हैं. कानून और भावना में सामंजस्य का होना जरूरी है, मेरे दृष्टिकोण से. हम क्या चाहते हैं कि अदालतों का दरवाजा खटखटाएं .. कोई भी आम व्यक्ति मजबूरी में ही कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगता है. अगर सब कुछ आपसी समझ से ठीक-ठाक रहे तो इन कोर्ट कचहरियों की आवश्यकता ही न पड़े. फिर वहीं जरूरत आन पड़ती है नैतिकता की, परंपरा की. परिवर्तन समय की मांंग है और अब जहाँ महिलाएं सजग हुई हैं वहीं माँ- बाप भी बेटे बेटियों में समानता का प्रयास करते दीख र्रहे हैं. कोई व्यक्ति एक बेटी में ही खुश रहता है …कई बेटियां होने पर भी वह बेटी में ही बेटा का रूप देखता है. … थोड़ा हम आगे बढ़ें थोड़ा तुम आगे बढ़ो. समाज को भी बदलना होगा और बदलाव आएगा, सही शिक्षा से, नैतिकता से … बस मेरी सोच तो यही कहती है. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
February 5, 2016

आप ठीक कह रहे हैं जवाहर जी । कानून और भावना में सामंजस्य रहे, इसी में सभी का हित है । पुत्र एवं पुत्री को समान दृष्टि से देखा जाए तथा उनके साथ समान व्यवहार किया जाए, यह समय की मांग है । धीरे-धीरे समाज तथा देश के सभी वर्ग इसे समझते जा रहे हैं । जो अब भी नहीं समझ रहे हैं, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं । सही शिक्षा और तदनुरूप विकसित सही सोच से ही सही बदलाव आएगा । बहुत-बहुत आभार आपका ।

atul61 के द्वारा
February 5, 2016

महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय का निराकरण हो और उन्हें अपना जायज़ हक़ मिले, इस बारे में कोई दो-राय नहीं हो सकती । किन्तु साथ ही यह भी तो सुनिश्चित हो कि स्त्री-पुरुष सौहार्द्र अक्षुण्ण रहे, परिवार न टूटें, समाज न बिखरे ।इस के लिए माथुर साहब कानून भी ऐसा न हो जिसे हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सके I मैं बात कर रहा हूँ दहेज़ निरोधक धारा 498ए की जिसका दुरपयोग महिलाओं व उनके मायकेवालों के द्वारा आजकल बखूबी किया जा रहा है Iसमाज को जाग्रत कर ही असली न्याय हो सकता है कानून के द्वारा केवल दबंगई रोकी जानी चाहिए Iकानून का सहारा लेकर दबंगई करना भी अपराध निर्धारित होना चाहिए I कानून का दुरपयोग महिला व पुरुष आजकल दोनों कर रहे हैं I सादर अभिवादन माथुर साहब अच्छा लेख लिखा है

Jitendra Mathur के द्वारा
February 5, 2016

मैं आपके दृष्टिकोण से पूर्णरूपेण सहमत हूँ अतुल जी । हार्दिक आभार आपका ।

O P Pareek के द्वारा
February 5, 2016

अद्भुत विश्लेषण माथुरजी, आपको साधुवाद. देखिये नारी समाज एक मायने में देखा जाय तो दलितों से भी कहीं अधिक शोषित रहा है और आज तक है. दलितों की पैरवी करने वाले (चाहे वोट के लिए ही सही) तो राजनीती में भी अनेकों हैं पर स्त्रियों के लिए कोई नहीं. आपने सही सवाल उठाये हैं. और ये अधिकारों की बात सिर्फ हिन्दू धर्म ही नहीं सभी धर्मों में नारी वर्ग की उपेखा की गयी है.. शाह बानो केस इसका ज्वलंत उदाहरण है.

Jitendra Mathur के द्वारा
February 5, 2016

बिलकुल सही कह रहे हैं पारीक जी आप । सभी धर्म नारियों के साथ अन्याय करने में ही अग्रणी रहे हैं । राजनीतिक दल भी नारियों को समान अधिकार देने की बात ही करते हैं, वास्तव में कुछ देने की नीयत नहीं रखते । स्त्रियों का अपने आप में कोई वोट बैंक जो नहीं । जो दलितों और पिछड़ों के नाम पर शोर मचाते हैं, वे नारियों के साथ अन्याय करने में कहीं पीछे नहीं रहते । आधी आबादी के प्रति उनका यह दोगला नज़रिया हर कदम पर दिखाई दे जाता है । बहुत-बहुत आभार आपका ।

bhagwandassmendiratta के द्वारा
February 5, 2016

माननीय जितेंद्र माथुर जी “पारिवारिक संपत्ति में स्त्री के अधिकार”अति सुविचारित एवं तथ्यों से पूर्ण लेख है बहुत बहुत साधुवाद | इस विषय पर बहुत कुछ कहा गया है परन्तु अभी भी समाज को और जागरूक करने की आवशयकता है |सभ्यता के विकास से ही स्त्री उपेक्षित रही हैसंदेह ही नहीं | कुछ अपवाद छोड़ दें तो स्थिति आज भी कमो बेश वैसी ही बनी हुई है| कानून के भय से थोड़ा बहुत परिवर्तन आया है परन्तु मानसिकता अभी भी नहीं बदली| लेकिन इस समस्या का एकमात्र समाधान शिक्षा है| बढ़ती जनसँख्या के साथ संपत्तियां भी कितनी बची हैं लेकिन आज वक्त बौद्धिक संपत्ति का है न कोई बाँट सकता है न कोई छीन सकता है झगड़ा भी कोई नहीं| पाश्चात्य देशों ने बहुत पहले इस जरूरत को समझा | स्त्री हो या पुरुष सभी अपने पांव पर खड़े हैं भौतिक संपत्ति में ज्यादा उलझना ही नहीं होता | लेकिन अपने देश की विडंबना देखो, शिक्षा का ढिंढोरा बहुत पीटा जा रहा है| जमीनी सचाई बहुत ही कड़वी है |शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाये काफी समस्याएं दूर होती जाएँगी | जब तक आप जैसे बुद्दिजीवियों का सरोकार दिखलाई देता है उम्मीद बाकि है | धन्यवाद |

Jitendra Mathur के द्वारा
February 5, 2016

बिल्कुल ठीक कहा है भगवानदास जी आपने । यही दृष्टिकोण चाहिए आज । हार्दिक आभार आपका ।

Shobha के द्वारा
February 6, 2016

श्री जितेन्द्र जी महिलाओं के लिए सम्वेदना से परिपूर्ण लेख मेरी बेटी ने हमें बहुत सम्मान दिया है |मेने जो चाहा वही पढाई के सर्टीफिकेट लिए बेटी को भी बेटे के समान पालो उसे संस्कार भी दो वह माता पिता को ख़ुशी से निहाल कर देती है

Jitendra Mathur के द्वारा
February 6, 2016

हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी । पूरी तरह सहमत हूँ आपसे । बेटी को भी बेटे के समान ही पालना चाहिए और उसे ऐसे साँचे में ढालना चाहिए जो उसे संस्कारी भी बनाए, सक्षम भी ।

harirawat के द्वारा
February 9, 2016

माथुरजी लेख पढ़ा, आपने वास्तविकता को उजागर करके काफी सामग्री उपलब्ध करके गुमराह लोगों का मार्ग दर्शन किया है ! सचमुच में आप धन्यवाद के पात्र हैं ! रही भाई बहीन के स्नेह के धागे से जुड़े रहने की बात, तो जो भाई बहिन निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर प्रेम के धागे से जुड़े हुए हैं उनके स्नेह पर इन कानूनों का कोई असर नहीं पड़ता !

Jitendra Mathur के द्वारा
February 9, 2016

हार्दिक आभार आपका रावत जी । आपकी बात बिल्कुल सही है ।


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