जितेन्द्र माथुर

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मानवता का कलंक - सैडिज़्म अथवा परपीड़ानन्द

Posted On: 19 Mar, 2016 Others में

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अभी-अभी आदरणीया मीनाक्षी जी का गोरैया संबंधी संवेदनापूर्ण आलेख पढ़कर मेरा मन भावुक हो गया । उन्होंने सच ही लिखा है कि पहले बच्चे अपने घरों में गोरैया को देखते थे, उसको दाना चुगाते थे, पानी पिलाते थे तो उनके दिलोदिमाग में दया-करुणा जाग्रत होती थी पर आज बच्चों के अंदर वो सब संस्कार नहीं आ पा रहे । आज छोटे-छोटे-से बच्चे क्रोध में आपे से बाहर होते घरों में देखे जाते हैं ।  इसका एक कारण यह है कि वे प्रकृति से दूर घरों में अधिक बंद रहते हैं । अब वो कम उम्र में ही बड़े हो जाने लगे हैं जिसकी वजह यह है कि वे अब खुली हवा और वातावरण में न विचरकर घरों के अंदर ही बंद रहते हुए टी.वी. में प्रोग्राम देखते रहते हैं जिनमें से कई प्रोग्राम तो उनकी उम्र से बहुत आगे के होते हैं । इसके अतिरिक्त वे कम्प्यूटर, मोबाइल आदि में गेम खेलते हैं । अधिकांश ऐसे गेम हिंसा से भरे होते हैं । ये तथा ऐसी ही अनेक बातें जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाने की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं, बालकों में एक नकारात्मक गुण को विकसित करती हैं । उस नकारात्मक गुण का अंग्रेज़ी नाम है – सैडिज़्म अर्थात दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर आनंदित होने की प्रवृत्ति ।

मैंने अपने साढ़े चार दशक के जीवनकाल में परपीड़ा से आनंदित होते हुए और उस वीभत्स आनंद को प्राप्त करने के लिए दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हुए प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों को, प्रत्येक सामाजिक वर्ग के लोगों को, प्रत्येक संस्कृति और प्रदेश के लोगों को तथा स्त्रियों और पुरुषों दोनों को देखा । और इससे भी अधिक दुखद तथ्य मैंने यह देखा कि ऐसे परपीड़क प्रवृत्ति के लोगों को अपने इस अवगुण की अनुभूति तक नहीं होती है । जब अनुभूति ही न हो तो अवगुण को दूर करने का प्रयास भी कैसे हो ? मैंने स्वयं अत्यंत कठिन एवं तनावपूर्ण बाल्यकाल तथा किशोरावस्था को भुगता । लेकिन मेरे जीवन की कठिनाइयों ने मेरे भीतर जन्म से ही उपस्थित संवेदनशीलता को ही विकसित किया, परपीड़क प्रवृत्ति मेरे व्यक्तित्व का अंग कभी नहीं बन सकी । बल्कि मैंने तो अपना जीवन-सिद्धान्त यही बनाया कि कभी किसी का दिल न दुखाओ । मैंने अपना मूल व्यक्तित्व अपने स्वर्गीय पिता से विरासत में पाया है जो अधिक शिक्षित तो नहीं थे लेकिन स्वभाव ऐसा कोमल पाया था कि किसी की भी दुख-तक़लीफ से पिघल जाया करते थे और अपने सीमित साधनों से जो कुछ भी बन पड़ता था, उसके लिए करते थे । और मेरा मानना है कि चाहे ऐसे लोग अब बहुत कम रह गए हैं, फिर भी कुछ हैं अन्यथा यह धरती रसातल में चली गई होती ।

लेकिन मुझे अपने को किसी के द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा से भी अधिक पीड़ा इस तथ्य से होती है कि आज परपीड़ानन्द के आकांक्षी अर्थात सैडिस्ट लोगों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है । दूसरों को कष्ट पहुँचाने में अपना आनंद पाने वाले लोग अब हर स्थान, हर संगठन और हर क्षेत्र में टिड्डी-दल की तरह मिलने लगे हैं । संवेदनशीलता घटती जा रही है, परपीड़क आनंद लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है । ऐसा वीभत्स आनंद प्राप्त करने के लिए दूसरों को पीड़ा केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं वरन मानसिक स्तर पर भी पहुँचाई जाती है । अपने पद और अधिकार का दुरुपयोग करके अन्य व्यक्तियों को भौतिक अथवा आर्थिक हानि पहुँचाकर या उन्हें उनके उचित अधिकार से वंचित करके या उनका मानसिक उत्पीड़न करके भी परपीड़ानन्द प्राप्त किया जाता है । ऐसा नकारात्मक और अवांछनीय आनंद प्राप्त करने की मानसिकता रखने वाले व्यक्ति भी विभिन्न संगठनों और संस्थानों में बहुतायत में पाए जाते है । मैं कभी नहीं समझ पाया कि किसी को उसके ऐसे लाभ से वंचित करके जिसकी वह सम्पूर्ण पात्रता रखता है या अनावश्यक असुविधा और मानसिक तनाव पहुँचाकर किसी विशिष्ट प्रस्थिति अथवा पद पर बैठे लोगों को आनंद कैसे प्राप्त होता है । लेकिन ऐसा होता तो है । बहुत-से लोग दूसरों को अपमानित करके भी ऐसा आनंद प्राप्त करते हैं । विचित्र बात यह है कि दूसरों को अपमानित करने में आनंद का अनुभव करने वाले स्वयं सदा दूसरों से सम्मान की ही अपेक्षा रखते हैं । अपने कार्यशील जीवन में कई अवसरों पर यह देखकर मैं दंग रह गया कि ऐसे लोग उनसे भी सम्मान चाहते हैं जिनका वे स्वयं ही अपमान करते हैं । ईसा मसीह और महात्मा गांधी जैसे लोगों ने कहा था कि दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो, जैसा तुम दूसरों से अपने लिए चाहते हो । लेकिन परपीड़ानन्द की विकृति से ग्रसित लोग इसका ठीक विपरीत करते हैं । उन्हें अपने लिए तो सद्व्यवहार चाहिए, आदर-मान चाहिए और अपने सारे अधिकार, लाभ व सुविधाएं चाहिए लेकिन दूसरों को वे इनमें से कुछ नहीं देना चाहते । दूसरों का दिल दुखाते समय उन्हें तनिक भी भान नहीं होता कि यदि कोई उनका दिल दुखाए तो उन्हें कैसा लगेगा । ऐसे लोग यदि औरों को उनका जायज़ हक़ या सहूलियत देते भी हैं तो कई-कई चक्कर कटवाकर और उन्हें बारंबार नीचा दिखाकर अपनी ऊंची हैसियत का अहसास करवाते हुए । कैसे गवारा करता है उनका ज़मीर ऐसा करने के लिए ? कैसे वे मनुष्य-देह लेकर भी यूँ मनुष्यता से पतित हो जाते हैं ? मेरे जैसे संवेदनशील व्यक्ति के लिए इस बात को समझ पाना लगभग असंभव ही है ।

कहते हैं तलवार का घाव भर जाता है लेकिन बात का घाव नहीं भरता है । लेकिन अपनी बातों से दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर आनंदित होने वाले सैडिस्ट लगभग प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक परिवेश में मिल जाते हैं । पहले से ही दुखी या तनावग्रस्त व्यक्ति को सांत्वना देने वाली कोई बात कहने के बजाय उसके दुख या तनाव को और बढ़ाने वाली जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें कहकर भी परपीड़क लोग प्रसन्न होते हैं । मैं स्वयं ऐसे अनेक लोगों के संपर्क में आया हूँ जिनको अपनी जली-कटी बातों से दूसरों के दुख और हृदय के बोझ को और बढ़ाने में एक विचित्र-सा, विद्रूप-सा आनंद आता है । न जाने किस प्रकार समाजीकरण हुआ होता है उनका, न जाने कैसे संस्कार मिले होते हैं उन्हें अपने परिवारों से ? ऐसे लोगों के लिए तो मैं हमेशा एक ही बात कहता हूँ – अरे अच्छे काम नहीं कर सकते तो अच्छी बात तो कहो और वो भी तुमसे न बन पड़े तो किसी के दर्द को बढ़ाने वाली बातें कहने से तो परहेज़ करो ! किसी के ज़ख़्म पर मरहम न लगा सको तो कम-से-कम नमक तो न छिड़को !

मैं निर्दोष पशुओं को असीम कष्ट पहुँचाकर अथवा उनका प्राणान्त करके उनके माँस अथवा अन्य अंगों के उपभोग को भी सैडिज़्म की ही श्रेणी में रखता हूँ । जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन । संभवतः तामसी आहार भी मनुष्य की संवेदनशीलता को घटाता है और उसके स्वभाव को परपीड़ा की ओर उन्मुख करता है । जब भी मैं किसी बालक अथवा वयस्क को किसी भी पशु अथवा पक्षी अथवा लघु प्राणी को को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुँचाते देखता हूँ तो मेरे मन में हूक-सी उठती है और मुझे यही अनुभूति होती है कि इस बालक अथवा वयस्क को उचित संस्कार नहीं मिले । मनुष्यों में परपीड़ानन्द की नकारात्मक प्रवृत्ति के उभार का ही यह परिणाम है कि चाहे गोरैया विलुप्त हो जाए या बाघ, मनुष्यों को कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि उनकी मानसिकता यही हो गई है कि बस हमारी स्वार्थ-सिद्धि होती रहे, बाकी चाहे सभी प्राणी समाप्त हो जाएं ।

परपीड़ानन्द वस्तुतः मानवी नहीं दानवी प्रवृत्ति है । औरों को दारूण दुख पहुँचाकर कोई राक्षस ही आनंदित हो सकता है । लेकिन सांप्रदायिक दंगों और बड़े आंदोलनों के दौरान ऐसे राक्षस छुट्टे घूमते हैं और असहायों विशेषकर स्त्रियों पर ऐसे-ऐसे अत्याचार करते हैं कि जिन्हें देख-सुनकर परमपिता परमात्मा का हृदय भी कंपित हो जाए । भारतीय उपमहाद्वीप में तो निर्बलों और असहायों के रक्षक कहलाने वाले वर्दीधारी ही या तो स्वयं ही आततायी बन जाते हैं या फिर निर्दोषों पर अवर्णनीय अत्याचार कर रहे आततायियों के कृत्यों की ओर से नेत्र मूंदकर उन्हें अपना मौन समर्थन और अप्रत्यक्ष सहयोग देते हैं । ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि उनके भी परिवार हैं, बालक हैं, माताएं-बहनें-पुत्रियां हैं । क्या उन्हें नहीं सूझता कि यदि उनके अपनों पर ऐसे अमानुषिक अत्याचार हों तो वे उसे कैसे सहन कर पाएंगे ?

बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि परपीड़ानन्द की ऐसी प्रवृत्ति विकसित कैसे होती है ? कुछ लोगों में ऐसी प्रवृत्ति के विकास के लिए उनका कठिनाइयों, अन्यायों और अत्याचारों का शिकार बाल्यकाल उत्तरदायी होता है । लेकिन मेरे विचार में अधिसंख्य सैडिस्ट अथवा परपीड़क लोग ऐसे अपने नकारात्मक संस्कारों के कारण बनते हैं जिसके लिए उनका दोषपूर्ण लालन-पालन या समाजीकरण उत्तरदायी होता है । जब बालक का सम्यक चरित्र-निर्माण नहीं होगा तो वह मनुष्यों को मनुष्यों की तरह कैसे देखेगा ? वास्तविक अर्थों में संवेदनशील व्यक्ति तो मनुष्यों के ही नहीं, प्राणिमात्र के प्रति इस प्रकार करुणा से भरा होता है कि वह किसी पशु को भी कष्ट नहीं पहुँचा सकता, किसी चींटी की भी मृत्यु का कारण बनना उसे स्वीकार्य नहीं हो सकता । क्या अब हम इस योग्य नहीं रहे कि समाज के लिए ऐसे संवेदनशील सदस्यों तथा राष्ट्र के लिए ऐसे संवेदनशील नागरिकों का निर्माण कर सकें ?

सैडिज़्म अथवा परपीड़ानन्द मानवता का कलंक है जिसे मिटना ही चाहिए । इसे मिटाने के लिए आइए, अपने बालगोपालों को चरित्रवान बनाएं, उनके व्यक्तित्व में संवेदना को भरें, उनके मन में परहिताभिलाषा के बीज बोएं, उन्हें ऐसे उत्तम संस्कार दें कि परपीड़ा से आनंदित होना तो दूर, वे किसी को भी हानि या दुख पहुँचाने का विचार तक न करें और वे दूसरों की पीड़ा को हरने में अपना आनंद पाएं, किसी को पीड़ा देने में नहीं । मुझे संतोष है कि मैं अपनी संतानों को ऐसे ही संस्कार दे सका हूँ । आज वे न केवल पशु-पक्षियों पर करुणा दर्शाते हैं वरन अन्य व्यक्तियों को भी अकारण कष्ट पहुँचाने से बचते ही हैं ।

मुझे गहन दुख होता है यह देखकर कि धार्मिकता का पाखंड करने वाले भी अनेक लोग सैडिस्ट अथवा परपीड़क स्वभाव के होते हैं जो लोकदिखावे के लिए रामायण (या अन्य धार्मिक ग्रंथ) का पाठ तो करते हैं लेकिन परोपकार के स्थान पर परपीड़ा में रुचि अधिक लेते हैं । ऐसे लोगों को मैं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का प्रिय भजन स्मरण कराना चाहता हूँ – वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीर पराई जाने रे। पराई पीर को जान लेने, अनुभूत कर लेने में ही सच्ची धार्मिकता निहित है, ईश्वर के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा निहित है । मैं सम्पूर्ण रामचरितमानस चाहे न पढ़ पाऊं लेकिन गोस्वामी तुलसीदास के इस सनातन और कालजयी संदेश को मैंने जीवनभर के लिए हृदयंगम कर लिया है -

परहित सरिस धर्म नहीं भाई

परपीड़ा सम नहीं अधमाई

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 20, 2016

श्री जितेंद्र जी बहुत अच्छा भावनात्मक लेख “बात घूम-फिरकर वहीं आ जाती है कि परपीड़ानन्द की ऐसी प्रवृत्ति विकसित कैसे होती है ? ” एक बात मेरी समझ में आती है कहीं कसूर वार माता पिता भीं हैं बच्चों को किसी भी बात से टोकते नहीं हैं एक प्रवृति है जोहमें नहीं मिला वह हम सब इन्हें देंगे कुछ ऐसा होता है जिसे देने में असमर्थ हैं उन्हेंबच्चे छीनने लगते हैं बंद कमरों में कम्प्यूटर में बच्चे क्या देख रहे हैं कार रेस कर रहे हैं उसके साथ उत्तेजना में चीख रहें हैं |मेरे समय में ऐसा नहीं था बच्चों को न सुनने की आदत थी खिलोने भी अच्छे होते थे बड़ी मुश्किल से मिलते थे |बात बात पर मुक्के चलाना किसी पर भी गाडी चढ़ा देना आपने आज की परिस्थितिओं के अनुसार सामयिक लेख द्वारा पाठकों को सोचने के लिए विवश किया है

Jitendra Mathur के द्वारा
March 20, 2016

हार्दिक आभार शोभा जी । मैं सहमत हूँ आपकी बात से कि माता-पिता भी बच्चों के ऐसे दोषपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए उत्तरदायी होते हैं क्योंकि वे ही हिंसक प्रवृत्ति को उभारने वाले खेल उन्हें लाकर देते हैं और कंप्यूटर या मोबाइल पर ऐसे खेलों या कार्यक्रमों को देखने से उन्हें रोकते-टोकते नहीं । यह सोच कि ‘जो हमें नहीं मिला, हम उन्हें क्यों न दें’ भी दोषयुक्त ही है जिसके अनुपालन में उचित-अनुचित के भेद की उपेक्षा हो जाती है ।

jlsingh के द्वारा
March 20, 2016

आदरणीय जितेंद्र जी आप मेरे कितने करीब होते जा रहे हैं आप को मैं बताऊँ? मेरे पुराने ब्लॉग का कुछ हिस्सा मेरे बाबूजी -मेरे बाबूजी बहुत ही नियमित जीवन ब्यतीत करते थे .. प्रकृति के आस-पास ही रहते थे, इसलिए उन्हें जल्दी कोई बीमारी भी नहीं होती थी, दिनभर खेतों में काम करने के बावजूद, शाम को रामायण लेकर दालान में बैठ जाते थे और लालटेन की रोशनी में रामायण पढ़कर लोगों को सुनाते और समझाते थे…. मेरे गाँव के बहुत सारे लोग मेरे बाबूजी को श्रद्धा की नजरों से देखते थे. वे एक गृहस्थ होते हुए सदाचार का भरपूर पालन करते थे. हर पूर्णमासी या विशेष पर्व त्यौहार के दिन पटना जाकर गंगा-स्नान करना और वहां से कुछ मिठाई आदि लेकर ही घर लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल था. ऐसा कोई दिन नहीं होता था जिस दिन वे बिना नहाये और पूजा किये खाना खाए होंगे! यह नियम उनका तबतक चलता रहा, जबतक कि वे लाचार होकर बिस्तराधीन नहीं हो गये. उनके अंतिम क्षणों में मैं और मेरे भैया दोनों ने यथासंभव सेवा की .. मैं समझता हूँ आज भी उनका आशीर्वाद हम सबके साथ है – उनका ब्रहम वाक्य – “बेटा हो सके तो किसी का भला कर दो, पर किसी का बुरा चाहना भी मत!” उनके उदगार में कुछ पक्तियां कोई बच्चा जब रोता हो उसका बापू ही धोता हो तब खैर नहीं होगी उसकी खायेगा चाचा की फटकी बच्चे को गोद उठाकर के लेमनचूस खिला कर के बाबूजी तब खुश होते थे कंधे पर उसको ढोते थे. पूरे ब्लॉग का लिंक भी दे रहा हूँ – http://jlsingh.jagranjunction.com/2012/06/15/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80/ और परहित सरिस धरम नहीं भाई … मेरे जीवन का भी मूल मन्त्र है. सादर! बच्चे को संस्कार देना माँ बाप का काम है यही कहूँगा. हाँ हम समाज से प्रभावित जरूर होते हैं क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है. सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
March 21, 2016

हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर जी । समान विचारों और भावनाओं से युक्त हृदय निकट आ ही जाते हैं । आपने अपने ब्लॉग और कविता दोनों के अंश यहाँ देकर मुझे कृतार्थ किया और अपने ब्लॉग का लिंक देकर तो इस ब्लॉग की उपयोगिता बहुत बढ़ा दी । मैंने आपकी भावभीनी रचना ‘मेरे बाबूजी की लघुकथा’ पढ़ी जिसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं । ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई’ को यथासंभव अपनाना चाहिए लेकिन मेरा यह लेख दोहे की दूसरी पंक्ति ‘परपीड़ा सम नहीं अधमाई’ पर केन्द्रित है । परपीड़ा तो वैसे ही अवांछनीय है और उससे आनंदित होने वाले को तो मनुष्य कहलाने का ही अधिकार नहीं क्योंकि परपीड़ा से आनंद तो कोई राक्षस ही प्राप्त कर सकता है ।

sadguruji के द्वारा
March 23, 2016

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! सार्थक और विचारणीय लेखन के लिए हार्दिक अभिनन्दन ! दूसरों को दुःख देकर ख़ुशी महसूस करना एक मानसिक विकृति है, जिसके लिए पूर्वकृत यानि पूर्वजन्म के कर्मों के अलावा संगति और माता पिता के दिए हुए संस्कार भी जिम्मेदार होते हैं ! पहले संत गाँव गाँव गली गली पैदल घूमते थे और अच्छे सस्कारों के सात्विक बीज बोते थे ! अब तो महल जैसे आश्रम, राजनीति और उलजुलूल बोलकर नारदमुनि जैसी मीडिया पर छाये रहना ही उनकी दिनचर्या है ! जबतक गरीबों के झूठ बोलने, जुआ खेलने, दारु पीने, गाली-गलौज और लड़ाई-झगड़ा करने के कुसंस्कार नहीं बदलेंगे, मोदी जी अकेले क्या करेंगे और उनकी किस्मत कितना बदल देंगे, जो खुद अपने कर्मों से अपनी किस्मत खराब कर रहे हैं ! आदरणीय जितेंद्र माथुर जी, आपको और आपके समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई ! सादर आभार !

Jitendra Mathur के द्वारा
March 24, 2016

आपको एवं आपके परिवार को भी होली की हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय सद्गुरु जी । साथ ही हार्दिक आभार आपके आगमन और सार्थक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए । मैं आपसे सहमत हूँ ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 17, 2016

उत्कृष्ट आलेख ,जीवन में हजारों बार इस तरह के सैडिस्टिक लोगों से सावका पड़ा है जो आपके सहकर्मी ,पड़ोसी या रिश्तेदार होते हैं आप को दर्द देकर ,आपको को दुखी देख कर सुख और तृप्ति अनुभब करते हैं परन्तु दुखी भी होते हैं आप की तरक्की और खुशियाँ देखकर ,ये अपने मकडजाल में उलझे रहते हैं .आप ने बहुत उम्दा लेख लिखा है आदरणीय जितेन्द्र जी ,आभार .

Jitendra Mathur के द्वारा
August 17, 2016

हार्दिक आभार आदरणीया निर्मला जी । दुख होता है यह देखकर कि ऐसे परपीड़क लोगों से आज समाज और संसार भरा पड़ा है तथा इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है ।


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