जितेन्द्र माथुर

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व्यक्ति-पूजा के जोखिम

Posted On: 9 Apr, 2016 Others में

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मेरी यह दृढ़ मान्यता एवं दृढ़ विश्वास है कि हमारी आस्था जीवन-मूल्यों, नैतिक सिद्धांतों तथा सद्गुणों में होनी चाहिए न कि व्यक्तियों में । व्यक्ति-पूजा अनेक जोखिमों से युक्त होती है । इसके अतिरिक्त यह न तो व्यष्टि के हित में होती है और न ही समष्टि के हित में । आपके द्वारा किसी भी विषय का अथवा किसी भी संदर्भ में उचित विश्लेषण, उचित मूल्यांकन तथा उचित निर्णय तभी संभव है जब आपका दृष्टिकोण पूर्णरूपेण वस्तुपरक हो न कि व्यक्तिपरक । कोई भी प्रशंसा हो अथवा समर्थन, आलोचना हो अथवा विरोध; वह व्यक्ति-विशेष के लिए न होकर विचारार्थ विषय-वस्तु के लिए होना चाहिए । अभिव्यक्ति की सार्थकता वस्तुनिष्ठता में ही निहित है, व्यक्तिनिष्ठता में नहीं ।

लेकिन हम में से अधिकांश प्रायः इसका विपरीत ही करते हैं । हम समर्थन भी करते हैं तो व्यक्तियों का, विरोध भी करते हैं तो व्यक्तियों का । इसीलिए हमारे समर्थन और विरोध में भावना तथा पूर्वाग्रह ही प्रधान होते हैं, तर्क एवं तथ्य नहीं । इसीलिए हमारी अभिव्यक्तियां संतुलित न होकर अतिरेकपूर्ण होती हैं । ऐसी अभिव्यक्तियों के बहाने हम वस्तुतः संबंधित व्यक्तियों के प्रति अपने मन में भरे लगाव अथवा उनके विरुद्ध अपने मन में भरे गुबार का ही विरेचन करते हैं । स्वाभाविक ही है कि अभिव्यक्ति में जब भावनाएं प्रधान हो जाती हैं तो तर्क एवं विवेक स्वतः ही गौण हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में तर्क के आधार पर किसी का समर्थन अथवा विरोध नहीं किया जाता वरन समर्थन अथवा विरोध के निमित्त तर्कों का बलपूर्वक सृजन किया जाता हैं । पहले तय कर लिया जाता है कि समर्थन किसका करना है तथा विरोध किसका करना है, तदोपरांत उसे न्यायोचित ठहराने के लिए तर्क गढ़े जाते हैं ।

वैज्ञानिक तथा तर्कसम्मत विश्लेषण को ही सर्वोपरि मानने वाले वर्तमान युग में भी चहुँओर व्यक्ति-पूजा ही प्रभावी दृष्टिगोचर होती है । चाहे अपना पूजन करवाने को लालायित व्यक्ति सप्रयास अपनी छवि निर्मित करे अथवा उसके स्वयंभू भक्त बिना किसी प्रोत्साहन के अपनी ओर से ही उसके पादुका-पूजन एवं छवि-निर्माण में संलग्न हो जाएं, व्यक्ति-पूजा कभी भी समष्टिगत हितों के अनुकूल नहीं हो सकती । इसमें संलिप्त व्यक्ति इसके जोखिमों को या तो समझते नहीं या समझना चाहते नहीं क्योंकि उनके लिए उनकी अपरिपक्व भावनाएं या उनके तात्कालिक हित (जो कि पूजित व्यक्ति की छत्रछाया पर आधारित होते हैं) ही प्रधान बन जाते हैं किन्तु दीर्घकाल में उससे होने वाली हानि सम्पूर्ण समाज को सहनी पड़ती है । कभी-कभी ऐसा व्यक्ति स्वयं भी इस पूजा के दुष्परिणाम भुगतने पर विवश हो जाता है जब उससे उसके भक्तों की अपेक्षाएं इतनी बढ़ जाती हैं कि उसके लिए उन पर खरा उतरना कठिन हो जाता है ।

भारत के महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने वर्षों पूर्व बाल पत्रिका ‘पराग’ के लिए लिखे अपने एक आलेख में कहा था कि वे कभी भी अपनी प्रशंसा में बह नहीं जाते थे क्योंकि वे जानते थे कि क्रिकेट में जय-जय जितनी जल्दी होती है, हाय-हाय भी उतनी ही जल्दी होती है । अमिताभ बच्चन अथवा सचिन तेंदुलकर अथवा महेंद्रसिंह धोनी के मंदिर बनाने वाले उनके अतिउत्साही प्रशंसक भूल जाते हैं कि जब व्यक्ति का समय सदा एक-सा नहीं रह सकता तो अपने क्षेत्र में उसका प्रदर्शन भी सदा एक-सा नहीं रह सकता । ऐसे में गुण-दोषों से युक्त एक सामान्य मानव को जीते-जी देवता के रूप में प्रतिष्ठित करना न केवल अनुचित तथा हास्यास्पद है वरन उसके प्रति अन्यायपूर्ण भी है ।

लेकिन शताब्दियों तक सामंतवादी व्यवस्थाओं में रही भारतीय जनता के एक बड़े भाग को ऐसे व्यक्ति-पूजन की आदत पड़ गई है । इसके उदाहरण विभिन्न संस्थानों, प्रतिष्ठानों एवं विभागों में दिन-प्रतिदिन दृष्टिगोचर होते हैं । ऐसी व्यक्ति-पूजा और कुछ नहीं वरन चाटुकारिता का ही एक उन्नत एवं परिष्कृत रूप होती है । जो भी व्यक्ति संबंधित संस्थान, प्रतिष्ठान अथवा विभाग के सर्वोच्च पद पर पहुँच जाता है, उसे ऐसे पूजन की प्राप्ति पदेन आधार पर हो जाती है । ऐसा व्यक्ति यदि विवेकशील एवं परिपक्व हो तो तुरंत भाँप लेता है कि उसकी यह पूजा-अर्चना उसकी नहीं वरन उस आसन की है जिस पर वह इस समय विराजमान है । उसकी अक़्ल में यह बात रहती है कि जब कुर्सी नहीं रहेगी तो मुरीदों की मुराद भी नहीं रहेगी । अतः वह न केवल स्वयं संयमित एवं ऐसी पूजा से यथासंभव अप्रभावित रहता है वरन पूजकों को भी एक सीमा से आगे नहीं जाने देता । लेकिन ऐसा व्यक्ति यदि अविवेकी एवं अपरिपक्व हो तो अपनी ऐसी पूजा के नाद में वास्तविकता को विस्मृत करके अपने मन में अपने लिए भ्रम पाल लेता है जिसके दुष्परिणाम वह भविष्य में भुगतता है ।

भारत में ऐसी व्यक्ति-पूजा का विशालतम क्षेत्र राजनीति है । प्रशासन की भाँति शासन में भी ऐसी पूजा के अंकुर संबंधित व्यक्ति के उच्च पद पर पहुँचने से ही फूटते हैं । राजनीति में सफलता का अर्थ है सत्ता की प्राप्ति और भारतीय राजव्यवस्था में सत्ताधारियों के पास असीमित शक्तियां होती हैं । ऐसे में सत्ता के शिखर बिन्दुओं पर जा बैठने वालों का ईश्वर की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर लेना स्वाभाविक ही होता है । अधिकांश धर्मभीरु भारतीय तो भगवान का भजन भी या तो कुछ पाने की मंशा से करते हैं या फिर किसी ज्ञात अथवा अज्ञात विपदा से बचने की मंशा से । ऐसे में जिसके हाथ में सत्ता है, वह भगवान से कम भला कैसे हो सकता है ? इसलिए सत्ता जिसे मिलती है, उसे भक्त अपने आप मिल जाते हैं । और भक्तों का यह जमावड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता ही जाता है । प्रचार के सभी साधन और विभिन्न क्षेत्र जिनमें सत्ता का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष हस्तक्षेप होता है, ऐसे भक्तों से भर जाते हैं जिनकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने प्रभु का स्तुतिगान ही होती है, अन्य कुछ नहीं ।

भक्त कभी अपने आराध्य में दोष नहीं देख सकता । इसलिए भारतीय राजनेताओं के स्वघोषित भक्त उनके प्रत्येक कथन एवं प्रत्येक कर्म की बिना गुणदोषों के विवेचन के जय-जयकार ही करते हैं क्योंकि यही उनका धर्म बन चुका है । अब निष्पक्ष पत्रकारिता का युग नहीं रहा । पत्रकारों का बहुमत भी ऐसे व्यक्तियों से ही निर्मित होता है जो किसी-न-किसी राजनेता के अनन्य भक्त हों । ऐसे घनघोर भक्त अपने भगवान में दोष देखने वाले अथवा उसकी आलोचना करने वाले के निंदक बन जाते हैं, उसके विरोधियों और विपक्षियों के घोर शत्रु बन जाते हैं । कोई उनके भगवान के कामकाज की वस्तुपरक समीक्षा करे, यह भी उन्हें गवारा नहीं होता क्योंकि भगवान तो भूल कर ही नहीं सकते । ऐसे भक्त अपने भगवान के प्रतिपक्ष में स्थित लोगों को दानव-रूप में ही चित्रित करते हैं और स्वयं को भगवान की सेना के सैनिक समझकर उन कथित दानवों पर ऐसे टूट पड़ते हैं मानो उनके सर्वनाश हेतु धर्मयुद्ध कर रहे हों । संचार क्रांति के इस युग में ऐसे धर्मयुद्ध का सबसे अधिक प्रचलित और सबसे अधिक प्रभावी अस्त्र है लेखनी जो लेखक के भगवान के लिए अर्घ्य और उसके विरोधी ‘दैत्यों’ के लिए विष उगलती है ।

व्यक्ति-पूजा अपने साथ अनेक जोखिमों को लिए चलती है । अंधभक्तों को तो इससे अधिक अंतर नहीं पड़ता किन्तु विचारशील भक्तों के लिए अनेक बार यह दुविधा की स्थिति उत्पन्न कर देती है क्योंकि उन्हें अपने विवेक के स्वर को अनसुना करके ऐसी बातों का भी समर्थन करना पड़ता है जिन्हें वे अपने अन्तर्मन में अनुचित समझते हैं । वर्तमान समय में जाति-आधारित आरक्षण पर होने वाले विमर्श से इसे भलीभाँति समझा जा सकता है । जो लोग इसे राष्ट्रहित में नहीं समझते, उन्हें भी इसे न्यायसंगत सिद्ध करने की विवशता को सहना पड़ता है क्योंकि उनके भगवान इसके पक्ष में अपनी सम्पूर्ण क्षमता और ऊर्जा के साथ बोल रहे हैं । इसके अतिरिक्त कभी-कभी भगवान अनपेक्षित रूप से ऐसा कार्य कर बैठते हैं जो उनके भक्तों के मन में उनकी पवित्र छवि को खंडित कर देता है और भक्त अपने आपको भयंकर रूप से ठगा हुआ अनुभव करते हैं । बाल ठाकरे के अनन्य भक्त एवं उत्तर भारत में शिवसेना के प्रखर नेता जयभगवान गोयल को २००८ में ऐसी स्थिति का साक्षात्कार तब करना पड़ गया था जब उनके भगवान उत्तर भारतीयों के विरुद्ध अभियान चलाने लगे थे । ऐसे में जयभगवान गोयल को स्वयं ही दल नहीं छोड़ना पड़ा वरन शिवसेना की दिल्ली इकाई को ही भंग कर देना पड़ा । जितेन्द्र माथुर नामक एक आदर्शवादी युवक पर तब मानो बिजली गिरी थी जब उसके लिए आराध्य सदृश श्रेणी में आने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भारत का प्रधानमंत्री बनने के उपरांत राष्ट्रहित में उनसे अपेक्षित कोई कार्य करने के स्थान पर मण्डल आयोग के प्रतिवेदन को अनायास ही लागू करके भारतीय समाज को स्थायी रूप से खंड-खंड कर डाला था । ऐसा धोखा किसी के भी साथ हो सकता है । ऐसा झटका किसी को भी लग सकता है । क्यों ? क्योंकि जिन्हें भक्त भगवान समझ बैठता है, वे वस्तुतः भगवान न होकर साधारण मानव ही होते हैं । और इंसान कमज़ोरियों का पुतला है । वह ग़लतियां कर सकता है । वह गुनाह कर सकता है ।

राजनेताओं के संदर्भ में व्यक्ति-पूजा का एक जोखिम यह भी होता है कि भक्त अपने भगवान के राजनीतिक विरोधियों को विशुद्ध खलनायक मानकर अपने नायक (अर्थात भगवान) का प्रतिनिधित्व करते हुए उन पर बिना सोचे-विचारे हल्ला बोलने लगता है । स्वाभाविक रूप से ऐसा करते समय वह तथ्यों, तर्कों एवं वस्तुपरक आकलनों की उपेक्षा ही करता है क्योंकि उसका चित्त तो इसी बिन्दु पर स्थिर होता है कि मैं अपने भगवान के पक्ष में हूँ तथा उनके विपक्षियों के विरुद्ध । मेरे भगवान का प्रत्येक कथन, प्रत्येक कृत्य एवं प्रत्येक विचार उचित है जबकि उनके विपक्षियों का प्रत्येक कथन, प्रत्येक कृत्य एवं प्रत्येक विचार अनुचित । ऐसे व्यक्तियों की भाषा और बातें रजवाड़ों के युग के चारणों जैसी हो जाती हैं जो आठों प्रहर अपने अन्नदाता के यशोगान में तथा उनके शत्रुओं को उनके समक्ष तुच्छ सिद्ध करने में ही अपने अस्तित्व की सार्थकता मानते थे । वे अकबर और बीरबल के उस किस्से की याद दिला देते हैं जिसमें बीरबल ने अकबर से कहा था – ‘आप बैंगन को अच्छा कहेंगे तो मैं भी उसे अच्छा ही कहूंगा और आप बैंगन को बुरा कहेंगे तो मैं भी उसे बुरा ही कहूंगा क्योंकि मैं बैंगन का नहीं, आपका नौकर हूँ ।’ ऐसा एकांगी दृष्टिकोण रखते-रखते तो अच्छा-भला विवेकशील व्यक्ति भी अपने निर्मल मन को विषाक्त कर लेता है, अनावश्यक रूप से नकारात्मक और द्वेषपूर्ण चित्तवृत्तियां विकसित कर लेता है, अपने संतुलित व्यक्तित्व को असंतुलित कर लेता है । इसके अतिरिक्त उसकी पक्षपातपूर्ण विचाराभिव्यक्ति उन लोगों पर भी विपरीत एवं दोषपूर्ण प्रभाव डालती है जो उस पर विश्वास करते हैं एवं उसके द्वारा कही गई बातों को सत्य मानते हैं ।

भारतीय राजनीतिक दलों का एकमात्र उद्देश्य सत्ताप्राप्ति होता है । इसीलिए उनके मूल चरित्र वास्तविक अर्थों में समरूप एवं समतुल्य ही होते हैं । उनमें भिन्नता केवल प्रदर्शनी होती है । इसी तथ्य का विस्तार यह है कि कतिपय अपवादों के अतिरिक्त सभी भारतीय राजनेता सत्तालोलुप ही होते हैं चाहे वे जनसेवा का कितना ही दम भरें । उनका प्रत्येक कथन, प्रत्येक कृत्य, प्रत्येक सार्वजनिक भावभंगिमा एवं प्रत्येक दृष्टिकोण सत्ताप्राप्ति से ही अभिप्रेरित होता है, अन्य किसी बात से नहीं । इसीलिए वे अपने प्रतिपक्षियों के प्रति ‘मैं उजला तू काला’ की नीति ही अपनाते हैं । उनका स्थायी नारा यही होता है – ‘मुझमें कोई दोष नहीं, तुझमें सारे दोष’ । सामान्य समय में स्वभावतः तथा चुनावी समय में विशेष रूप से वे अपने प्रतिपक्षियों पर कीचड़ उछालते हैं और नाना प्रकार की अनर्गल बातें एकदूसरे के लिए कहते हैं । ऐसे व्यक्तियों को भगवान की श्रेणी में रखना भगवान का अनादर ही है क्योंकि भगवान रागद्वेष से मुक्त होते हैं तथा अपने भक्तों को भी उसी पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं । इसीलिए मैं सभी से आग्रह करता हूँ कि पूजा करनी हो तो परमपिता परमात्मा की करें, सद्गुणों की करें, शाश्वत जीवन मूल्यों की करें न कि हाड़-माँस-रक्त से बने व्यक्तियों की जिन्हें सर्वगुणसंपन्न एवं देवतुल्य मानना स्वयं को छलने से अधिक कुछ नहीं । साथ ही स्वयं को पुजवाकर आनंदित होने वाले व्यक्तियों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि आप उन्हीं के लिए ख़ास हैं जिन्हें आपसे कुछ आस है ।

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
April 9, 2016

आदरणीय जीतेन्द्र माथुर जी, आपने जितना सार्थक विश्लेषण अपनी चमत्कारिक लेखन शैली में किया है, वह बहुत ही काम जगह देखने को मिलेगा. हालाँकि लेखकीय एवं पत्रकारिता का धर्म यही है की हम संतुलित और उचित विचार रक्खें. आज के परिवेश में या प्राचीन परिवेश में भी यही होता रहा है. कहीं विदुर तो कहीं नारद जी या बीरबल आइना दिखाते रहे हैं, पर जब स्वत्व का नशा सवार होता है तो कहाँ किसी की सुनता है. फिर भी हर व्यक्ति को यह आत्मबोध होना ही चाहिए की वह अपने आपको संतुलित रख सके.

Jitendra Mathur के द्वारा
April 10, 2016

हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर जी । आपके विचारों से मैं पूर्णरूपेण सहमत हूँ कि जब स्वत्व का नशा सवार होता है तो व्यक्ति कहाँ किसी की सुनता है, तथापि प्रत्येक व्यक्ति को यह आत्मबोध होना ही चाहिए कि वह अपने आपको संतुलित रख सके ।

Shobha के द्वारा
April 10, 2016

श्री आदरणीय जितेन्द्र जी आपका लेख बहुत अच्छा लेख हर बार पढ़ने पर सोचने को नई दिशा देता लेख ात : में दो तीन बार पढ़ने के बाद उसका सार समझ कर सोचती हूँ व्यक्ति पूजा हमारी राजनीति में इतनी घर कर गई हैं विवेक का प्रयोग ही हम नहीं करते हैं सामने वाले को भी प्रशंसा मैग्लोमैनिक बना देती है बहुत कम ऐसे हैं जो अपनी निंदा सुन सक्ले हैं फिर लिख रही हूँ बहुत अच्छा लेख ऐसा लग रहा है जैसे पेपर पढ़ रही हूँ |”राजनीति में सफलता का अर्थ है सत्ता की प्राप्ति और भारतीय राजव्यवस्था में सत्ताधारियों के पास असीमित शक्तियां होती हैं । ऐसे में सत्ता के शिखर बिन्दुओं पर जा बैठने वालों का ईश्वर की श्रेणी में स्थान प्राप्त कर लेना स्वाभाविक ही होता है” बहुत अच्छे विचार

Jitendra Mathur के द्वारा
April 10, 2016

हार्दिक आभार आदरणीया शोभा जी ।

jlsingh के द्वारा
April 13, 2016

कल के दैनिक जागरण में आपके ब्लॉग के मुख्यांश देखकर मुझे बहुत खुशी हुई! आप मेरे फेसबुक मित्र भी बन जाएँ तो मुझे अच्छा लगेगा!

Jitendra Mathur के द्वारा
April 13, 2016

बहुत-बहुत आभार जवाहर जी आपका जो आपने यह महत्वपूर्ण सूचना मुझे दी अन्यथा मैं इससे अनभिज्ञ ही रहता । जागरण को लेखक को इस बाबत सूचित अवश्य करना चाहिए । मैं फ़ेसबुक पर बहुत कम रहता हूँ । तथापि मैं आपसे फ़ेसबुक एवं ई-मेल दोनों ही माध्यमों से संपर्क बनाकर रखूंगा ।

achyutamkeshvam के द्वारा
July 13, 2016

व्यक्ति-पूजा पूजक और पूजनीय दोनों के लिए घातक है . पूजा व्यक्ति की नहीं व्यक्तित्व की हो ……उसके गुणों को अपना कर …. आपके विषय अछूते और शैली अनुपम है …. बधाई

Jitendra Mathur के द्वारा
July 13, 2016

हार्दिक आभार आदरणीय अच्युत जी जो आपने मेरे लेख को पढ़ने के लिए अपना अमूल्य समय निकाला तथा मेरे विचार-बिन्दु से सहमति व्यक्त की ।


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