जितेन्द्र माथुर

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सोनिया गाँधी के नाम खुला पत्र

Posted On: 4 Feb, 2017 Others में

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माननीया सोनिया जी,

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सादर नमस्कार ।

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सर्वप्रथम तो मैं आपके शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ के लिए अपनी सदिच्छाएं अर्पित करता हूँ क्योंकि आपके स्वास्थ्य की स्थिति दीर्घावधि से चिंताजनक बनी हुई है और जो सूचनाएं सार्वजनिक संचार माध्यमों से आ रही हैं, वे आपके हितैषियों तथा प्रशंसकों के लिए उत्साहवर्धक नहीं हैं । योग्य चिकित्सकों की चिकित्सा तथा ईश्वर की अनुकंपा से आप अतिशीघ्र पूर्ण स्वस्थ एवं ऊर्जस्विनी हों, मैं यही प्रार्थना करता हूँ ।

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इस देश में आपके शुभचिंतक भी इने-गिने ही हैं और प्रशंसक भी । आपका जन्म इस देश में नहीं हुआ, दूसरे देश में हुआ, इसी बात को आधार बनाकर आपके सभी सद्गुणों पर धूलि डाल दी जाती हैं और सभी प्रकार के सच्चे-झूठे आरोप आप पर आपके विरोधियों द्वारा इस धारणा के अंतर्गत मढ़ दिए जाते हैं कि आपके विदेश-जन्मा होने के कारण जनता ऐसी सभी बातों पर निष्प्रमाण ही विश्वास कर लेगी । संभवतः उनकी यह धारणा ठीक भी है क्योंकि विगत सामान्य चुनाव में वे ऐसा करके राजनीतिक लाभ पाने में सफल रहे हैं । लेकिन जो विवेकशील लोग पूर्णतः वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से सभी तथ्यों को परखकर ही कोई धारणा बनाते हैं या किसी सूचना पर विश्वास करते हैं, वे आपके ऊपर लगाए जा रहे लांछनों के खोखलेपन को भाँप सकते हैं और अपने मन में स्थित आपकी निर्मल छवि को अक्षुण्ण रख सकते हैं । ऐसे लोग ही आपके सच्चे शुभचिंतक और प्रशंसक हो सकते हैं । और सच्चे शुभचिंतक एवं प्रशंसक संख्या में चाहे कितने भी कम हों, उन मौसमी समर्थकों से निस्संदेह बेहतर होते हैं जो ऋतु-परिवर्तन के साथ ही अपना स्थान परिवर्तित कर लेने वाले पक्षियों की भाँति अपने स्वार्थों के अनुरूप अपनी निष्ठा एवं दृष्टिकोण को विस्थापित करते रहते हैं । आपके व्यक्तित्व एवं चरित्र की निर्मलता एवं उदात्तता को देखने-परखने और स्वीकार करने वाले आपके ऐसे सच्चे प्रशंसक आज भी भारत में हैं । मैं उन्हीं में से एक हूँ ।

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मैं एक अराजनीतिक व्यक्ति हूँ लेकिन विगत साढ़े तीन दशकों से भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ावों पर दृष्टि रख रहा हूँ । मैंने आपके व्यक्तित्व में रुचि लेना तब आरंभ किया था जब आपके पति स्वर्गीय राजीव गाँधी भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन थे एवं लोकप्रिय राजनीतिक पत्रिका ‘माया’ में तत्कालीन भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में आप पर आवरण कथा छपी थी । उस समय मैंने उस आवरण कथा को चाहे रस लेकर पढ़ा हो, धीरे-धीरे मुझ पर यह सत्य उद्घाटित हुआ कि वह तथा आप पर लिखे गए वैसे ही कई अन्य आलेख केवल अटकलबाज़ियों पर आधारित थे । चूंकि आपने अपने इर्द-गिर्द एक रहस्य का वातावरण बनाया हुआ था तथा आप अपने लिए कही जा रही अनुमानाधारित बातों का खंडन नहीं करती थीं (वस्तुतः आप सार्वजनिक जीवन से पूर्ण दूरी बनाए रखती थीं), इसीलिए आपके विषय में कई किवदंतियों ने जन्म लिया और मुझ जैसे बहुत से लोग वर्षों तक भ्रमित होते रहे । लेकिन राजीव जी के असामयिक निधन के उपरांत मैंने आपके वास्तविक व्यक्तित्व को पहचानना आरंभ किया और अंततः मैं आपके भीतर छुपी उस संवेदनशील मानवी को देख पाने में सफल हुआ जिससे आज भी इने-गिने लोग ही परिचित हैं । मैं स्वयं एक संवेदनशील मनुष्य हूँ और एक संवेदनशील व्यक्ति ही किसी दूसरे व्यक्ति की संवेदनशीलता को देख-सुन-पहचान सकता है, उसे सराह सकता है ।

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सोनिया जी, आप जन्म से चाहे विदेशी हैं किन्तु पहले एक प्रेयसी, फिर पत्नी एवं पुत्रवधू और फिर एक माँ के रूप में आपका जीवन एक आदर्श भारतीय स्त्री जैसा ही रहा है जिसने एक भारतीय पुरुष को अपने जीवन साथी के रूप में स्वीकार किया तथा उसके जीवनकाल में एक आदर्श सहधर्मिणी के रूप में सदा उसके साथ खड़ी रही । अपनी सास स्वर्गीया इन्दिरा गाँधी के जीवनकाल में आप एक आदर्श पुत्रवधू की भांति सदा उनकी इच्छा एवं दिशानिर्देशों के अनुरूप ही रहीं । इसीलिए इन्दिरा जी का मातृवत् स्नेह उनकी देशी पुत्रवधू मेनका को नहीं, आपको मिला । आप अपने पति के राजनीति में जाने के पक्ष में नहीं थीं किन्तु जब कालचक्र ने आपके पति को राजनीति में धकेल ही दिया तो आपने अपने पति को अपना सम्पूर्ण नैतिक समर्थन दिया क्योंकि आप उनसे हृदय से प्रेम करती थीं । आप कभी अनावश्यक रूप से सुर्खियों में नहीं आईं तथा अपने पति के प्रधानमंत्रित्व काल में आपने अपने व्यक्तित्व की निजता तथा गरिमा को अक्षुण्ण बना रखा । जब आपके पति का असामयिक निधन हो गया तो इस पहाड़ जैसे दुख को अपने हृदय की परिधि में समेटे हुए आपने अपने पितृहीन बालकों का पालन-पोषण स्वयं को भारतीय राजनीति से पूरी तरह से दूर रखते हुए किया । आपने वैधव्य को भी उसी गरिमा के साथ जिया जिस गरिमा के साथ आप अपने सुहागिन रूप में रहा करती थीं । और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं । यह आपके आत्मबल, दृढ़ इच्छाशक्ति एवं व्यक्तित्व की गहनता का जीताजागता प्रमाण है ।

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आप सादगी में विश्वास रखती हैं एवं आडंबरों से सदैव दूर रहती हैं । इसका प्रमाण मुझे तब मिला था जब आपने अपनी पुत्री का विवाह अत्यंत साधारण ढंग से बिना किसी तड़क-भड़क एवं अपव्यय के किया । १८ फ़रवरी, १९९७ को यह विवाह सम्पन्न हुआ था । मैं उस दिन दिल्ली में ही था । पूर्व प्रधानमंत्री की पुत्री का विवाह तो वैभवपूर्वक तथा भरपूर प्रचार के साथ भी किया जा सकता था किन्तु मैं स्वयं इस बात का गवाह हूँ कि इस विवाह को गिने-चुने अतिथियों की उपस्थिति में अत्यंत सादा तरीके से सम्पन्न कराया गया था तथा पत्रकारों को भी इस समारोह से दूर रखा गया था ।

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आप कितनी संवेदनशील हैं इसका प्रमाण यह है कि आपने अपने पति की हत्या का षड्यंत्र रचने वालों को मृत्युदंड न दिए जाने के लिए स्वयं भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय के॰आर॰ नारायणन को पत्र लिखकर षड्यंत्रकारियों के लिए और विशेषतः नलिनी नाम की षड्यंत्रकारिणी के लिए क्षमादान मांगा था । अपने पत्र में आपने इस बात का संदर्भ दिया था कि नलिनी एक छोटी बच्ची की माता थी और स्वयं अपने पति को खोने की पीड़ा से गुज़रने तथा अपने बच्चों को उनके पिता को खोने की पीड़ा से गुज़रता देखने के कारण आप जानती थीं कि अपने माता या पिता को खो देने पर एक बालक पर क्या बीतती है । मुझे यह देखकर बहुत दुख हुआ था कि आपके इस अत्यंत मानवीय कार्य की भी राजनीतिक व्याख्या ही की गई थी । मुझ जैसे इने-गिने लोग ही आपके इस कार्य के पीछे आपके हृदय में बसी संवेदनशीलता को देख सके, भाँप सके, अनुभूत कर सके ।

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आपके विरोधियों से ही नहीं वरन समस्त भारतवासियों से मेरा प्रश्न है कि आप पर केवल आपके विदेशी मूल के कारण नाना प्रकार से आक्रमण किया जाए जिसमें शालीनता की सभी सीमाएं पार कर दी जाएं, यह किस दृष्टिकोण से उचित है ? काश लोग राजनीति से परे जाकर आपको केवल एक मानवी के रूप में देखें और निर्णय करें कि आपके श्लाघनीय गुणों को अनदेखा करना क्या आपके प्रति अन्यायपूर्ण नहीं है ! क्या आपके विरोधी भी अपने परिवारों में ऐसे ही मानवीय गुणों से युक्त तथा ऐसे ही दृढ़ संकल्प एवं साहस से परिपूर्ण परिपक्व व्यक्तित्व वाली पुत्रवधुएं नहीं चाहेंगे ? इसके विपरीत आपके प्रमुख राजनीतिक विरोधी तथा भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का कोई कट्टर समर्थक भी अपनी पुत्री के लिए उनके जैसा वर नहीं चाहेगा क्योंकि ऐसा अत्यंत सफल जामाता भी किस काम का जो अपनी ब्याहता पत्नी को उसका न्यायोचित अधिकार एवं सम्मान न दे ?

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आपने दल एवं सरकार के प्रमुख का पद १९९१ में ही ठुकरा दिया था जो आपके इस प्रकार की लालसाओं से निर्लिप्त होने का प्रमाण था । आगामी कुछ वर्षों में भी आपने स्वयं को अनावश्यक चर्चाओं एवं विवादों से पूरी तरह दूर रखा तथा राजनीति में किसी भी प्रकार की रुचि तब तक नहीं ली जब तक कि आपको यह नहीं लगा कि आपके परिवार की राजनीतिक विरासत पूरी तरह से नष्ट होने जा रही थी और उसे बचाने का प्रयास करना आपका कर्तव्य था । यदि आपने उस समय दल की बागडोर को न संभाल लिया होता तो सीताराम केसरी के तत्वावधान में इस देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल का अंतिम संस्कार १९९८ में ही हो गया होता । आपने न केवल दल को नष्ट होने से बचाया वरन आगामी कुछ वर्षों में अपने अथक परिश्रम से उसे पुनः चुनावी समर में खड़े होने योग्य बनाया और २००४ के सामान्य चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रत्यक्षतः अत्यंत लोकप्रिय सरकार को पराभूत करने का वह कार्य कर दिखाया जिसकी दूर-दूर तक किसी को अपेक्षा नहीं थी । यह आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास तथा लगन का सुफल था एवं इस शाश्वत सत्य का एक और उदाहरण था कि दृढ़-संकल्पी मनुष्य के सम्मुख नितांत विपरीत परिस्थितियाँ भी झुककर उसके अनुकूल हो जाती हैं ।

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आपका तो भारतीय राजनीति में पदार्पण करना ही आपका सबसे बड़ा त्याग था । उस पर आपने शासन-प्रमुख का पद दो बार ठुकराया । यह आपके त्यागमय स्वभाव तथा चारित्रिक दृढ़ता का परिचायक है । भारतीय संविधान के प्रावधानों के अंतर्गत आपको प्रधानमंत्री के पद पर आसीन होने का पूर्ण अधिकार था जिससे आपको रोका नहीं जा सकता था । लेकिन आपने स्वेच्छा से इस पद के प्रस्ताव को अस्वीकार किया एवं साफ-सुथरी छवि वाले डॉ॰ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया । तिस पर भी आप पर आरोप लगाया जाता रहा कि आप एक कठपुतली प्रधानमंत्री की आड़ में स्वयं सत्ता तथा सरकार का संचालन मानो रिमोट कंट्रोल से करती रहीं लेकिन इस बात का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है । यह एक सुनी-सुनाई बात है जिसे बिना किसी आधार के बार-बार दोहराया जाता है । और जैसा कि गोएबल्स ने कहा था – बार-बार दोहराए गए झूठ को लोग सच मानने लगते हैं‘, आपके लिए विभिन्न माध्यमों से बारंबार बोले गए इस झूठ को अब सच का रंग दे दिया गया है । जबकि वस्तुस्थिति यह है कि आपने डॉ॰ मनमोहन सिंह को अपने पद के संचालन एवं कर्तव्य-निर्वहन में पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की थी एवं अपनी ओर से तभी हस्तक्षेप किया था जब आपको ऐसा करना जनहित में आवश्यक लगा । भूमि-अधिग्रहण कानून के मामले में आपने जनहित में हस्तक्षेप करके संबंधित विधेयक में यथोचित संशोधन करवाए थे ताकि किसानों एवं आम लोगों की भूमि को बलपूर्वक हड़पा न जा सके । महिला आरक्षण विधेयक चाहे अंतिम रूप में पारित न हो पाया हो लेकिन उसके राज्य सभा की बाधा पार कर लेने में सफल हो जाना भी आपके अनवरत एवं निष्ठावान प्रयासों से ही संभव हो सका था । आप नारी-सशक्तिकरण में आस्था रखती हैं एवं महिलाओं को विधानमंडलों में आरक्षण दिलवाने की आपकी हार्दिक इच्छा थी जो नारी-विरोधी पुरुष-प्रधान राजव्यवस्था ने पूर्ण नहीं होने दी । आपके विश्वासी स्वभाव को जैसे १९९९ में मुलायमसिंह यादव ने छला था, वैसे ही एक दशक से अधिक समय के उपरांत आपके अपने ही दल के सदस्यों ने भी इस संदर्भ में उसके साथ छल ही किया ।

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सोनिया जी, इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है और इसीलिए वह न तो पूर्णरूपेण सत्य होता है और न ही वह पराजितों के साथ न्याय करता है । जब इतिहास आपके निर्मल-हृदय पति के साथ न्याय नहीं कर सका और बोफ़ोर्स सौदे की दलाली का मिथ्यारोप उन पर उनके देहावसान के दशकों पश्चात् आज तक लगाया जाता रहा है तो वह आपके साथ न्याय कैसे करेगा ? कौन स्वीकारेगा और मान्यता देगा भारत देश और भारतीय राजनीति में दिए गए आपके सकारात्मक योगदान को ? आपने तो अपने दल के सत्ता में रहते हुए भी किसी राजनीतिक विरोधी पर कोई प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं की लेकिन आपके राजनीतिक विरोधी ऐसे उदारमना नहीं हैं और तथ्यों को विकृत रूप में प्रस्तुत करते हुए सत्ता के दुरूपयोग से आपको हानि पहुँचाने का प्रयास सदा करते रहते हैं । आपने चुनाव प्रचार एवं राजनीतिक अभियानों में भाषा तथा भंगिमाओं की गरिमा सदा बनाए रखी और व्यक्तिगत आक्षेपों से परहेज़ रखा लेकिन आपके राजनीतिक विरोधी शालीनता की सभी सीमाएं तोड़ते हुए सदा आप पर व्यक्तिगत आक्रमण करते रहे । जब भी इटली से संबंधित कोई तथ्य सामने आता है, आप पर उंगलियाँ उठाई जाने लगती हैं मानो इटली में जन्म लेना कोई अपराध हो अथवा इटली कोई बुरा स्थान या देश हो । भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले आपके विरोधी इस सनातन भारतीय सामाजिक परंपरा को अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए विस्मृत कर देते हैं कि विवाह के उपरांत वधू अपने ससुराल की सदस्या होती है, अपने पितृगृह की नहीं । इस दृष्टि से भी एवं विगत आधी सदी में प्रदर्शित अपने सम्पूर्ण आचरण से भी आप सांगोपांग भारतीय ही हैं ।

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यह विपणन अथवा मार्केटिंग का युग है सोनिया जी तथा आपके वर्तमान प्रमुख राजनीतिक विरोधी मार्केटिंग की कला में निष्णात हैं । इसीलिए वे जनमानस में स्वयं को दुग्ध-धवल सिद्ध करने में एवं आपके दल पर कालिमा के आरोपण में सफल रहे हैं । काठ की हांडी चाहे बार-बार आँच पर न चढ़ सके, एक बार तो चढ़ ही जाती है । मैंने ऊपर ही कहा है कि बार-बार बोला गया झूठ सुनने वालों द्वारा सच मान लिया जाता है । इसीलिए आपके लिए निराधार झूठ इतनी बारंबारता तथा इतनी प्रचंडता के साथ बोले जाते हैं ताकि वे जनता की मानसिकता में गहरे पैठ जाएं और आमजन उन्हें शाश्वत सत्य समझ बैठें । आप कर्मयोगिनी हैं, विपणन-विशेषज्ञा नहीं । इसीलिए संभवतः आप अपने राजनीतिक विरोधियों की कुटिल चालों का उचित प्रत्युत्तर नहीं दे सकतीं । अब आपकी बढ़ती आयु एवं रुग्णावस्था के कारण भी आप राजनीतिक गतिविधियों हेतु यथेष्ट रूप से सक्रिय नहीं रह सकतीं । आपको पर्याप्त शारीरिक तथा मानसिक विश्राम की आवश्यकता है । एक हितैषी के रूप में मेरा आपको यही परामर्श है कि अब आप दल एवं राजनीति से संबंधित सभी दायित्वों से स्वयं को मुक्त कर लें ।

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सोनिया जी, एक माता के रूप में आपकी स्वाभाविक अभिलाषा होगी कि आपका पुत्र भारत के प्रधानमंत्री के पद पर शोभायमान हो । आपकी जगह यदि कोई भारतीय मूल की स्त्री होती तो एक माता के रूप में उसकी अभिलाषा भी यही होती । माता तो सदा यही चाहती है कि उसकी संतान सफलता की पराकाष्ठा पर पहुँचे । लेकिन सोनिया जी, प्रत्येक कार्यक्षेत्र प्रत्येक व्यक्ति के लिए नहीं होता । आपने यदि अपने पुत्र को २००९ में ही भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए आगे बढ़ा दिया होता तो आपकी अभिलाषा पूर्ण हो गई होती लेकिन आपने राष्ट्रहित में डॉ॰ मनमोहन सिंह को ही द्वितीय अवसर दे दिया और अब आपका पुत्र इस पद तक पहुँच सकेगा, इसकी संभावना अत्यंत क्षीण है । वह अभी भी राजनीति में अपरिपक्व है तथा मुझे तो यही लगता है कि वह भारतीय राजनीति के लिए बना ही नहीं है । राजनीति के लिए ही उसने विवाह नहीं किया जो कि मेरी दृष्टि में एक बड़ा व्यक्तिगत त्याग है । लेकिन इस त्याग की तो आवश्यकता ही नहीं सोनिया जी । क्या आपकी कामना नहीं होती कि आपके घर में पुत्रवधू के चरण पड़ें, पायल की छमछम एवं नवजात की किलकारियाँ गूँजें, आपको दादी बनने का गौरव प्राप्त हो ? होती है न ? तो फिर अपने पुत्र को विवाह करने के लिए प्रेरित कीजिए । पुरुष का विवाह अधिक आयु में भी संभव है । कई भारतीय राजनेताओं ने भी चालीस वर्ष की आयु पार करने के उपरांत विवाह किया है । वैवाहिक जीवन में प्रवेश करके उसके व्यक्तित्व की परिपक्वता भी बढ़ेगी ।

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बाकी अपने राजनीतिक दल को आप उसके भाग्य पर छोड़ दीजिए । नियति से कोई नहीं बच सकता सोनिया जी । यदि इस दल की नियति मिट जाना ही है तो यह मिटकर ही रहेगा । आप इसकी भाग्य-नियंता नहीं बन सकती हैं । आयु के इस पड़ाव पर अब आप इसका प्रयास भी न कीजिए । अब आप केवल अपने स्वास्थ्य तथा मानसिक शांति का ध्यान रखिए ।

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शुभकामनाओं सहित,

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जितेन्द्र माथुर

मानवता, नैतिकता एवं भारतीय संस्कारों में विश्वास रखने वाला एक भारतीय नागरिक

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 21, 2017

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! सादरअभिनंदन ! आपने अपने भावुक मन से बहुत कुछ लिखा है, उसमे से कुछ तथ्यपरक भी है ! किन्तु आपकी इस बात से सहमत नहीं कि “भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री का कोई कट्टर समर्थक भी अपनी पुत्री के लिए उनके जैसा वर नहीं चाहेगा क्योंकि ऐसा अत्यंत सफल जामाता भी किस काम का जो अपनी ब्याहता पत्नी को उसका न्यायोचित अधिकार एवं सम्मान न दे ?” आप भावना में बहकर इतिहास को ही भूल गए जो सत्य की खोज और राष्ट्र प्रेम के लिए घर परिवार के त्याग से भरा पड़ा है ! नरेन्द्र मोदी के अलावा भी महात्मा बुद्ध, महावीर, तुलसीदास, कई धर्मगुरुओं और बहुत से अन्य देशभक्तों ने भी यही महान कार्य किया ! सोनिया गांधी और नरेन्द्र मोदी की तुलना ही बेतुकी है ! परिवार संभालने से ज्यादा बड़ा कार्य देश संभालना है ! सबसे बड़ी बात ये कि पति-पत्नी आपसी रजामंदी से अपना अपना अलग जीने का मार्ग चुन लेते हैं तो उसमे बुरा क्या है ? देश में ऐसा करने वाले हजारों लाखों लोग हैं ! क्या वे सब निंदा के पात्र हैं ! नहीं, ये हमारी अपनी हीनभावना और बेतुकी सोच है जो हम उनकी स्वतंतत्रता और साथ न रह पाने वाली पीड़ा को महसूस नहीं करते हैं ! सादर आभार !

Jitendra Mathur के द्वारा
March 24, 2017

लेख पर आपकी सम्मानित उपस्थिति एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिए आपका सादर आभार आदरणीय सद्गुरु जी । कुछ संदर्भों में हम दोनों के मध्य वैचारिक मतभेद हैं और संभवतः आगे भी रहेंगे । इस सत्य के साथ हमें परिपक्व व्यक्तियों की भाँति समायोजन करना होगा । मैं व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के स्थान पर वस्तुपरक दृष्टिकोण को उचित समझता हूँ तथा मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि मूल्यांकन एवं आलोचनात्मक विश्लेषण में कभी दोहरे मानदंड नहीं अपनाए जाने चाहिए । इस संसार में न तो कोई सर्वगुणसम्पन्न अथवा देवतुल्य हो सकता है और न ही किसी को केवल दोषों से युक्त माना जाना उचित है । उपलब्ध ठोस तथ्यों के आधार पर सभी के गुण-दोषों का निष्पक्ष विवेचन होना चाहिए । अंध-श्रद्धा किसी दिन श्रद्धालु के ही ठगे जाने का कारण बन सकती है ।


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